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Samveda Mantra 451

1875 Mantra
Devata- उषाः Rishi- संवर्त आङ्गिरसः Chhand- द्विपदा विराट् Swara- पञ्चमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
उ꣣षा꣢꣫ अप꣣ स्व꣢सु꣣ष्ट꣢मः꣣ सं꣡ व꣢र्त्तयति वर्त꣣नि꣡ꣳ सु꣢जा꣣त꣡ता꣢ ॥४५१

उ꣣षाः꣢ । अ꣡प꣢꣯ । स्व꣡सुः꣢꣯ । त꣡मः꣢꣯ । सम् । व꣣र्त्तयति । वर्त्तनि꣢म् । सु꣣जात꣡ता꣢ । सु꣣ । जात꣣ता꣢ ॥४५१॥१

Mantra without Swara
उषा अप स्वसुष्टमः सं वर्त्तयति वर्तनिꣳ सुजातता ॥४५१

उषाः । अप । स्वसुः । तमः । सम् । वर्त्तयति । वर्त्तनिम् । सुजातता । सु । जातता ॥४५१॥१

Samveda - Mantra Number : 451
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 11;

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1 Bhashyas
Meaning
जैसे (उषाः) प्रभातकालीन प्राकृतिक उषा (स्वसुः) अपनी बहिन रात्रि के (तमः) अन्धकार को (अप) हटा देती है, और (सुजातता) अपने श्रेष्ठ जन्म से (वर्तनिम्) मार्ग को (सं वर्तयति) प्रकाशित कर देती है, वैसे ही (उषाः) योगशास्त्र में प्रसिद्ध आत्मख्याति (स्वसुः) आत्मा में राग, द्वेष आदि को प्रक्षिप्त करनेवाली अविद्या के (तमः) तामसिक प्रभाव को (अप) दूर कर देती है और (सुजातता) अपने शुभ जन्म से (वर्तनिम्) साधक के योगमार्ग को (सं वर्तयति) अध्यात्मप्रकाश से प्रकाशित कर देती है ॥५॥
Essence
जो मनुष्य अविद्यारूप रात्रि को दूर करके विवेकख्यातिरूप उषा के प्रकाश को प्राप्त करते हैं, वे मुक्ति के अधिकारी हो जाते हैं ॥५॥
Subject
अगले मन्त्र का देवता उषा है। उषा के महत्त्व का वर्णन है।