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Samveda Mantra 445

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- त्रसदस्युः Chhand- द्विपदा विराट् पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
अ꣡र्च꣢न्त्य꣣र्कं꣢ म꣣रु꣡तः꣢ स्व꣣र्का꣡ आ स्तो꣢꣯भति श्रु꣣तो꣢꣫ युवा꣣ स꣡ इन्द्रः꣢꣯ ॥४४५॥

अ꣡र्च꣢꣯न्ति । अ꣣र्कं꣢ । म꣣रु꣡तः꣢ । स्व꣣र्काः꣢ । सु꣣ । अर्काः꣢ । आ । स्तो꣣भति । श्रुतः꣢ । यु꣡वा꣢꣯ । सः । इ꣡न्द्रः꣢꣯ ॥४४५॥

Mantra without Swara
अर्चन्त्यर्कं मरुतः स्वर्का आ स्तोभति श्रुतो युवा स इन्द्रः ॥

अर्चन्ति । अर्कं । मरुतः । स्वर्काः । सु । अर्काः । आ । स्तोभति । श्रुतः । युवा । सः । इन्द्रः ॥४४५॥

Samveda - Mantra Number : 445
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 10;

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Meaning
(स्वर्काः) उत्तम स्तुति करनेवाले, अथवा उत्तम विधि से वेदमन्त्रों का उच्चारण करनेवाले (मरुतः) ऋत्विज् लोग (अर्कम्) अर्चनीय परमेश्वर की (अर्चन्ति) पूजा करते हैं। (श्रुतः) वेदों में प्रसिद्ध अथवा सुना गया, (युवा) सदा युवा, युवा के समान असीम बलवाला (सः) वह (इन्द्रः) परमेश्वर, उन्हें (आ स्तोभति) सहारा देता है ॥९॥ इस मन्त्र में अनुप्रास अलङ्कार है, साथ ही परस्पर उपकार करने रूप वस्तु से परिवृत्ति अलङ्कार व्यङ्ग्यहै ॥९॥
Essence
जो मनुष्य वेदमन्त्रों के गानपूर्वक परमात्मा की आराधना करते हैं, उन्हें वह अक्षय अवलम्ब देकर अनुगृहीत करता है ॥९॥
Subject
अगले मन्त्र में परमेश्वर की आराधना का फल वर्णित है।

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