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Samveda Mantra 440

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- त्रसदस्युः Chhand- द्विपदा विराट् पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
अ꣡न꣢वस्ते꣣ र꣢थ꣣म꣡श्वा꣢य तक्षु꣣स्त्व꣢ष्टा꣣ व꣡ज्रं꣢ पुरुहूत द्यु꣣म꣡न्त꣢म् ॥४४०॥

अ꣡न꣢꣯वः । ते꣣ । र꣡थ꣢꣯म् । अ꣡श्वा꣢꣯य । त꣣क्षुः । त्व꣡ष्टा꣢꣯ । व꣡ज्र꣢꣯म् । पु꣣रुहूत । पुरु । हूत । द्युम꣡न्त꣢म् ॥४४०॥

Mantra without Swara
अनवस्ते रथमश्वाय तक्षुस्त्वष्टा वज्रं पुरुहूत द्युमन्तम् ॥

अनवः । ते । रथम् । अश्वाय । तक्षुः । त्वष्टा । वज्रम् । पुरुहूत । पुरु । हूत । द्युमन्तम् ॥४४०॥

Samveda - Mantra Number : 440
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 10;

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Meaning
प्रथम—जीवात्मा के पक्ष में। हे (पुरुहूत) बहुतों से गुणकीर्तन किये गये जीवात्मन् ! (ते) तेरे लिए (अनवः) प्राण (अश्वाय) शीघ्रगमनार्थ (रथम्) शरीररूप रथ को (तक्षुः) रचते हैं, (त्वष्टा) जगत् का शिल्पी परमेश्वर (द्युमन्तम्) तेजोमय (वज्रम्) वाणी रूप वज्र को रचता है। उस यशोमय शरीर-रथ से जीवनयात्रा करता हुआ तू वाणीरूप वज्र से पाखण्डियों का खण्डन कर ॥ द्वितीय—राजा के पक्ष में। हे (पुरुहूत) बहुत-से प्रजाजनों द्वारा सत्कृत अखण्ड ऐश्वर्यवाले राजन् ! (ते) आपके लिए (अनवः) शिल्पी मनुष्य (अश्वाय) शीघ्रगमनार्थ (रथम्) यात्रा के तथा युद्ध के साधनभूत भूमि, जल और अन्तरिक्ष में चलनेवाले यान-समूह को (तक्षुः) रचें, (त्वष्टा) शस्त्रास्त्रों का निर्माता शिल्पी (द्युमन्तम्) चमचमाते हुए (वज्रम्) शस्त्रास्त्र-समूह को रचे। इसप्रकार रथ, शस्त्रास्त्र आदि युद्धसाधनों से युक्त होकर आप शत्रुओं को पराजित कर प्रजा को सुखी करें ॥४॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥४॥
Essence
जैसे जीवात्मा शरीर-रथ पर स्थित होकर वाणीरूप वज्र से कुतर्कों को खण्डित करता हुआ सत्यपक्ष की रक्षा करता है, वैसे ही राजा भूयान, जलयान और अन्तरिक्षयान में बैठकर वज्र से शत्रुओं का उच्छेद कर राष्ट्र की रक्षा करे ॥४॥
Subject
अगले मन्त्र में इन्द्र के रथ और वज्र के रचे जाने का विषय है।