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Samveda Mantra 438

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- त्रसदस्युः Chhand- द्विपदा विराट् पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
ए꣣ष꣢ ब्र꣣ह्मा꣢꣫ य ऋ꣣त्वि꣢य꣣ इ꣢न्द्रो꣣ ना꣡म꣢ श्रु꣣तो꣢ गृ꣣णे꣢ ॥४३८॥

ए꣣षः꣢ । ब्र꣣ह्मा꣢ । यः । ऋ꣣त्वि꣡यः꣢ । इ꣡न्द्रः꣢꣯ । ना꣡म꣢꣯ । श्रु꣣तः꣢ । गृ꣣णे꣢ ॥४३८॥

Mantra without Swara
एष ब्रह्मा य ऋत्विय इन्द्रो नाम श्रुतो गृणे ॥

एषः । ब्रह्मा । यः । ऋत्वियः । इन्द्रः । नाम । श्रुतः । गृणे ॥४३८॥

Samveda - Mantra Number : 438
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 10;

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1 Bhashyas
Meaning
(एषः) यह मेरे द्वारा अनुभव किया जाता हुआ परमेश्वर (ब्रह्मा) ज्ञान, गुण, कर्म आदि से सर्वतोवृद्ध होने के कारण ब्रह्मा कहलाता है, (यः ऋत्वियः) जिसकी पूजा की ऋतु सदा ही रहती है, और जो (इन्द्रो नाम श्रुतः) इन्द्र नाम से प्रसिद्ध है, उसकी मैं (गृणे) स्तुति करता हूँ ॥२॥
Essence
परमेश्वर सब दृष्टियों से वृद्ध, सब दृष्टियों से भद्र और सब ऋतुओं में उपासनीय है ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में इन्द्र परमात्मा का वर्णन किया गया है।