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Samveda Mantra 437

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- त्रसदस्युः Chhand- द्विपदा विराट् पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
वि꣡श्व꣢तोदावन्वि꣣श्व꣡तो꣢ न꣣ आ꣡ भ꣢र꣣ यं꣢ त्वा꣣ श꣡वि꣢ष्ठ꣣मी꣡म꣢हे ॥४३७

वि꣡श्व꣢꣯तोदावन् । वि꣡श्व꣢꣯तः । दा꣣वन् । विश्व꣡तः꣢ । नः꣢ । आ꣢ । भ꣣र । य꣢म् । त्वा꣣ । श꣡वि꣢꣯ष्ठम् । ई꣡म꣢꣯हे ॥४३७॥

Mantra without Swara
विश्वतोदावन्विश्वतो न आ भर यं त्वा शविष्ठमीमहे ॥४३७

विश्वतोदावन् । विश्वतः । दावन् । विश्वतः । नः । आ । भर । यम् । त्वा । शविष्ठम् । ईमहे ॥४३७॥

Samveda - Mantra Number : 437
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 10;

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1 Bhashyas
Meaning
हे (विश्वतोदावन्) सब ओर दान करनेवाले परमात्मन् वा राजन् ! आप (विश्वतः) सब ओर से (नः) हमारे लिए (आ भर) विद्या, धन, बल आदि लाइए, (यम्) जिन (शविष्ठम्) बलिष्ठ (त्वा) आपसे, हम (ईमहे) याचना कर रहे हैं ॥१॥ इस मन्त्र में अर्थ-श्लेष अलङ्कार, तथा ‘विश्वतो’ की आवृत्ति में लाटानुप्रास अलङ्कार है ॥१॥
Essence
जैसे परमेश्वर हमारे लिए वेदज्ञान, आत्मबल, देहबल तथा सूर्य, वायु, पृथिवी, सुवर्ण आदि धन देता है, वैसे ही राजा भी राष्ट्र में निरक्षरों को विद्या, निर्बलों को बल और निर्धनों को धन प्रदान करे ॥१॥
Subject
प्रथम मन्त्र में इन्द्र से धनादि की याचना की गयी है।