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Samveda Mantra 420

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- विमद ऐन्द्रः Chhand- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
आ꣡ग्निं न स्ववृ꣢꣯क्तिभि꣣र्हो꣡ता꣢रं त्वा वृणीमहे । शी꣣रं꣡ पा꣢व꣣क꣡शो꣢चिषं꣣ वि꣢ वो꣣ म꣡दे꣢ य꣣ज्ञे꣡षु꣢ स्ती꣣र्ण꣡ब꣢र्हिषं꣣ वि꣡व꣢क्षसे ॥४२०॥

आ꣢ । अ꣣ग्नि꣢म् । न । स्व꣡वृ꣢꣯क्तिभिः । स्व । वृ꣣क्तिभिः । हो꣡ता꣢꣯रम् । त्वा꣣ । वृणीमहे । शीर꣢म् । पा꣣वक꣡शो꣢चिषम् । पा꣣वक꣡ । शो꣣चिषम् । वि꣢ । वः꣣ । म꣡दे꣢꣯ । य꣣ज्ञे꣡षु꣢ । स्ती꣣र्ण꣡ब꣢र्हिषम् । स्ती꣣र्ण꣢ । ब꣣र्हिषम् । वि꣡व꣢꣯क्षसे ॥४२०॥

Mantra without Swara
आग्निं न स्ववृक्तिभिर्होतारं त्वा वृणीमहे । शीरं पावकशोचिषं वि वो मदे यज्ञेषु स्तीर्णबर्हिषं विवक्षसे ॥

आ । अग्निम् । न । स्ववृक्तिभिः । स्व । वृक्तिभिः । होतारम् । त्वा । वृणीमहे । शीरम् । पावकशोचिषम् । पावक । शोचिषम् । वि । वः । मदे । यज्ञेषु । स्तीर्णबर्हिषम् । स्तीर्ण । बर्हिषम् । विवक्षसे ॥४२०॥

Samveda - Mantra Number : 420
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 8;

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1 Bhashyas
Meaning
हम लोग (न) इस समय (होतारम्) सुख आदि के दाता, (शीरम्) सर्वत्र शयन करनेवाले, सर्वव्यापक (पावकशोचिषम्) पवित्रताकारक दीप्तिवाले (त्वा अग्निम्) आप अग्रनायक परमेश्वर को (स्व-वृक्तिभिः) अपनी सूक्तियों अथवा क्रियाओं से (आ वृणीमहे) वरते हैं। हम (वः मदे) आपके प्राप्त कराये हुए आनन्द में (वि) उत्कर्ष को प्राप्त करें। आप (यज्ञेषु) ब्रह्मयज्ञ, देवयज्ञ आदि पञ्च यज्ञों में तथा अन्य विविध परोपकार-रूप यज्ञों में (स्तीर्णबर्हिषम्) जिसने आसन बिछाया है अर्थात् उन यज्ञों को करने में जो प्रवृत्त हुआ है, उसे (विवक्षसे) विशेष रूप से उन्नत कर देते हो ॥२॥
Essence
परम आनन्द के प्रदाता, सर्वत्र व्यापक, अपने तेज से मनों को पवित्र करनेवाले, महान् परमेश्वर का सब यज्ञकर्ताओं को भौतिक अग्नि के समान वरण करना चाहिए ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में यह विषय है कि कैसे गुणवाले अग्नि परमेश्वर को हम वरते हैं।