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Samveda Mantra 408

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- सौभरि: काण्व: Chhand- ककुप् Swara- ऋषभः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
व꣣य꣢मु꣣ त्वा꣡म꣢पूर्व्य स्थू꣣रं꣢꣫ न कच्चि꣣द्भ꣡र꣢न्तोऽव꣣स्य꣡वः꣢ । व꣡ज्रि꣢ञ्चि꣣त्र꣡ꣳ ह꣢वामहे ॥४०८॥

व꣣य꣢म् । उ꣣ । त्वा꣢म् । अ꣣पूर्व्य । अ । पूर्व्य । स्थूर꣢म् । न । कत् । चि꣣त् । भ꣡र꣢꣯न्तः । अ꣣वस्य꣡वः꣢ । व꣡ज्रि꣢꣯न् । चि꣣त्र꣢म् । ह꣣वामहे ॥४०८॥

Mantra without Swara
वयमु त्वामपूर्व्य स्थूरं न कच्चिद्भरन्तोऽवस्यवः । वज्रिञ्चित्रꣳ हवामहे ॥

वयम् । उ । त्वाम् । अपूर्व्य । अ । पूर्व्य । स्थूरम् । न । कत् । चित् । भरन्तः । अवस्यवः । वज्रिन् । चित्रम् । हवामहे ॥४०८॥

Samveda - Mantra Number : 408
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 6;

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Meaning
हे (अपूर्व्य) अपूर्व गुण-कर्म-स्वभाववाले, (वज्रिन्) शस्त्रधारी के समान दोषनाशक परमेश्वर आचार्य वा वैद्यराज ! (कच्चित्) किसी (स्थूरं न) स्थूल गढ़े आदि के समान (स्थूरम्) मन, चक्षु आदि के स्थूल छिद्र को (भरन्तः) भरना चाहते हुए (अवस्यवः) रक्षा के इच्छुक (वयम्) हम (चित्रम्) पूज्य (त्वाम्) आपको (हवामहे) पुकारते हैं ॥१०॥ इस मन्त्र में श्लिष्टोपमालङ्कार है ॥१०॥
Essence
जैसे विशाल निर्जल अन्धे कुएँ आदि को भरना चाहते हुए लोग सहायक मित्रों को बुलाते हैं, वैसे ही मन, चक्षु आदियों के रोगरूप या अशक्तिरूप छिद्र को भरने के लिए परमेश्वर, आचार्य वा वैद्य की सहायता पानी चाहिए ॥१०॥ इस दशति में इन्द्र का महत्त्व वर्णित होने से, उसकी स्तुति होने से, उसका आह्वान होने से और उससे बल-धन आदि की याचना होने से तथा इन्द्र नाम से राजा, आचार्य, वैद्य आदि के भी कर्तव्य का वर्णन होने से इस दशति के विषय की पूर्व दशति के विषय के साथ संगति है ॥ पञ्चम प्रपाठक में प्रथम अर्ध की द्वितीय दशति समाप्त ॥ चतुर्थ अध्याय में छठा खण्ड समाप्त ॥
Subject
अगले मन्त्र में परमेश्वर, आचार्य वा वैद्य का आह्वान किया गया है।

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