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Samveda Mantra 393

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- नृमेध आङ्गिरसः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
ए꣡न्द्र꣢ नो गधि प्रिय꣣ स꣡त्रा꣢जिदगोह्य । गि꣣रि꣢꣫र्न वि꣣श्व꣡तः꣢ पृ꣣थुः꣡ पति꣢꣯र्दि꣣वः꣢ ॥३९३॥

आ । इ꣣न्द्र । नः । गधि । प्रिय । स꣡त्रा꣢꣯जित् । स꣡त्रा꣢꣯ । जि꣣त् । अगोह्य । अ । गोह्य । गिरिः꣢ । न । वि꣣श्व꣡तः꣢ । पृ꣣थुः꣢ । प꣡तिः꣢꣯ । दि꣣वः꣢ ॥३९३॥

Mantra without Swara
एन्द्र नो गधि प्रिय सत्राजिदगोह्य । गिरिर्न विश्वतः पृथुः पतिर्दिवः ॥

आ । इन्द्र । नः । गधि । प्रिय । सत्राजित् । सत्रा । जित् । अगोह्य । अ । गोह्य । गिरिः । न । विश्वतः । पृथुः । पतिः । दिवः ॥३९३॥

Samveda - Mantra Number : 393
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 5;

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Meaning
हे (प्रिय) प्रिय, (सत्राजित्) सत्य से असत्य पर विजय पानेवाले, (अगोह्य) छिपाये न जा सकनेवाले, किन्तु प्रकट हो जानेवाले (इन्द्र) परमात्मन् ! आप (नः) हमारे समीप (आ गधि) आओ। आप (गिरिः न) पर्वत के सदृश (विश्वतः पृथुः) सबसे विशाल और (दिवः पतिः) सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र, विद्युत् आदि से जगमगाते हुए जगत् के अधिपति हो ॥३॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार है ॥३॥
Essence
चर्म-चक्षुओं से अदृश्य भी परमेश्वर संसार में दिखायी देनेवाले अपने सत्य नियमों से और योगाभ्यासों से सबके सम्मुख प्रकट हो जाता है। आकाश को चूमनेवाले विस्तीर्ण पहाड़ के समान विशाल, सर्वव्यापक, सब ज्योतिष्मान् पदार्थों को ज्योति देनेवाला वह सब जनों से उपासना करने योग्य है ॥३॥
Subject
अगले मन्त्र में पुनः परमात्मा की महिमा वर्णित की गयी है।