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Samveda Mantra 392

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
य꣢स्य꣣ त्य꣡च्छम्ब꣢꣯रं꣣ म꣢दे꣣ दि꣡वो꣢दासाय र꣣न्ध꣡य꣢न् । अ꣣य꣡ꣳ स सोम꣢꣯ इन्द्र ते सु꣣तः꣡ पिब꣢꣯ ॥३९२॥

य꣡स्य꣢꣯ । त्यत् । शं꣡ब꣢꣯रम् । शम् । ब꣣रम् । म꣡दे꣢ । दि꣡वो꣢꣯दासाय । दि꣡वः꣢꣯ । दा꣣साय । रन्ध꣡य꣢न् । अ꣣य꣢म् । सः । सो꣡मः꣢ । इ꣣न्द्र । ते । सुतः꣢ । पि꣡ब꣢꣯ ॥३९२॥

Mantra without Swara
यस्य त्यच्छम्बरं मदे दिवोदासाय रन्धयन् । अयꣳ स सोम इन्द्र ते सुतः पिब ॥

यस्य । त्यत् । शंबरम् । शम् । बरम् । मदे । दिवोदासाय । दिवः । दासाय । रन्धयन् । अयम् । सः । सोमः । इन्द्र । ते । सुतः । पिब ॥३९२॥

Samveda - Mantra Number : 392
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 5;

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Meaning
हे (इन्द्र) विघ्नविदारक परमात्मन् ! (यस्य) जिस पुरुषार्थमिश्रित भक्तिरूप सोमरस के (मदे) हर्ष में (दिवोदासाय) मन आदि को प्रकाश देनेवाले जीवात्मा की सहायता के लिए, आप (शम्बरम्) योगमार्ग में आये आनन्द और शान्ति के आच्छादक विघ्नसमूह को (रन्धयन्) विनष्ट करते हुए (त्यत्) प्रसिद्ध वीर कर्म को करते हो, (अयं सः) यह वह (सोमः) पुरुषार्थमिश्रित भक्तिरस (ते) आपके लिए (सुतः) अभिषुत है, उसका (पिब) पान करो ॥२॥
Essence
पुरुषार्थपूर्ण भक्ति से आराधना किया गया परमेश्वर योगसाधक के मार्ग में आये हुए सब विघ्नों का निराकरण करके योगसिद्धि प्रदान करता है ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में परमात्मा के वीरतापूर्ण कर्म की प्रशंसा करते हुए उसका आह्वान किया गया है।