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Samveda Mantra 388

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- नृमेध आङ्गिरसः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
इ꣡न्द्रा꣢य꣣ सा꣡म꣢ गायत꣣ वि꣡प्रा꣢य बृह꣣ते꣢ बृ꣣ह꣢त् । ब्र꣣ह्मकृ꣡ते꣢ विप꣣श्चि꣡ते꣢ पन꣣स्य꣡वे꣢ ॥३८८॥

इ꣡न्द्रा꣢꣯य । सा꣡म꣢꣯ । गा꣣यत । वि꣡प्रा꣢꣯य । वि । प्रा꣣य । बृहते꣢ । बृ꣣ह꣢त् । ब्र꣣ह्मकृ꣡ते꣢ । ब्र꣣ह्म । कृ꣡ते꣢꣯ । वि꣣पश्चि꣡ते꣢ । वि꣣पः । चि꣡ते꣢꣯ । प꣣नस्य꣡वे꣢ ॥३८८॥

Mantra without Swara
इन्द्राय साम गायत विप्राय बृहते बृहत् । ब्रह्मकृते विपश्चिते पनस्यवे ॥

इन्द्राय । साम । गायत । विप्राय । वि । प्राय । बृहते । बृहत् । ब्रह्मकृते । ब्रह्म । कृते । विपश्चिते । विपः । चिते । पनस्यवे ॥३८८॥

Samveda - Mantra Number : 388
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 4;

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Meaning
हे मित्रो ! तुम (विप्राय) विशेषरूप से क्षतिपूर्ति करनेवाले अथवा ब्राह्मण के समान श्रेष्ठ ज्ञान का उपदेश करनेवाले, (बृहते) महान् (ब्रह्मकृते) वेदकाव्य के रचयिता, (विपश्चिते) सकल विद्याओं में पारंगत, (पनस्यवे) दूसरों की प्रशंसा और कीर्ति चाहनेवाले (इन्द्राय) राजराजेश्वर परब्रह्म परमेश्वर के लिए (बृहत्) बहुत अधिक (साम गायत) सामगान करो ॥८॥
Essence
मन्त्रोक्त गुण-कर्म-स्वभाववाले, महामहिमाशाली, विराड् ब्रह्माण्ड के अधिपति परमेश्वर की सस्वर सामगान की विधि से सबको उपासना करनी चाहिए ॥८॥
Subject
अगले मन्त्र में मनुष्यों को सामगान के लिए प्रेरित किया गया है।