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Samveda Mantra 376

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- सव्य आङ्गिरसः Chhand- जगती Swara- निषादः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
अ꣣भि꣢꣫ त्यं मे꣣षं꣡ पु꣢रुहू꣣त꣢मृ꣣ग्मि꣢य꣣मि꣡न्द्रं꣢ गी꣣र्भि꣡र्म꣢दता꣣ व꣡स्वो꣢ अर्ण꣣व꣢म् । य꣢स्य꣣ द्या꣢वो꣣ न꣢ वि꣣च꣡र꣢न्ति꣣ मा꣡नु꣢षं भु꣣जे꣡ मꣳहि꣢꣯ष्ठम꣣भि꣡ विप्र꣢꣯मर्चत ॥३७६॥

अ꣣भि꣢ । त्यम् । मे꣣ष꣢म् । पु꣣रुहूत꣢म् । पु꣣रु । हूत꣢म् । ऋ꣣ग्मि꣡य꣢म् । इ꣡न्द्र꣢꣯म् । गी꣣र्भिः꣢ । म꣣दत । व꣡स्वः꣢꣯ । अ꣣र्णव꣢म् । य꣡स्य꣢꣯ । द्या꣡वः꣢꣯ । न । वि꣣चर꣢न्ति । वि꣣ । च꣡र꣢꣯न्ति । मा꣡नु꣢꣯षम् । भु꣣जे꣢ । मँ꣡हि꣢꣯ष्ठम् । अ꣣भि꣢ । वि꣡प्र꣢꣯म् । वि । प्र꣣म् । अर्चत ॥

Mantra without Swara
अभि त्यं मेषं पुरुहूतमृग्मियमिन्द्रं गीर्भिर्मदता वस्वो अर्णवम् । यस्य द्यावो न विचरन्ति मानुषं भुजे मꣳहिष्ठमभि विप्रमर्चत ॥

अभि । त्यम् । मेषम् । पुरुहूतम् । पुरु । हूतम् । ऋग्मियम् । इन्द्रम् । गीर्भिः । मदत । वस्वः । अर्णवम् । यस्य । द्यावः । न । विचरन्ति । वि । चरन्ति । मानुषम् । भुजे । मँहिष्ठम् । अभि । विप्रम् । वि । प्रम् । अर्चत ॥

Samveda - Mantra Number : 376
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 3;

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1 Bhashyas
Meaning
(त्यम्) उस प्रसिद्ध, (मेषम्) सुखों से सींचनेवाले, (पुरुहूतम्) बहुतों से पुकारे गये, (ऋग्मियम्) अर्चना के योग्य, (वस्वः अर्णवम्) धन के समुद्र (इन्द्रम्) परमेश्वर वा राजा को (गीर्भिः) वाणियों से (मदत) हर्षयुक्त करो। (यस्य) जिस परमेश्वर वा राजा की (द्यावः) दीप्तियाँ, तेजस्विताएँ (मानुषम्) मनुष्य का (न विचरन्ति) अपकार नहीं करतीं, उस (मंहिष्ठम्) अतिशय महान् व दाता (विप्रम्) मेधावी विद्वान् परमेश्वर व राजा को (भुजे) अपने पालन के लिए (अर्चत) पूजित वा सत्कृत करो ॥७॥ ‘वस्वः अर्णवम्’ में समुद्रवाची अर्णव पद का लक्षणावृत्ति से निधि लक्ष्यार्थ होता है, निधि न कह-कर अर्णव कहने में अतिशय धनवत्त्व व्यङ्ग्य है। इन्द्र में अर्णव का आरोप होने से रूपक अलङ्कार है ॥७॥
Essence
जैसे सुखवर्षक, ऐश्वर्य का पारावार, सबसे अधिक महान्, सबसे बड़ा दानी, मेधावी परमेश्वर सबसे पूजा करने योग्य है, वैसे ही इन गुणों से युक्त राजा प्रजाजनों से सत्कृत और प्रोत्साहित किये जाने योग्य है ॥७॥ विवरणकार माधव ने इस मन्त्र पर यह इतिहास लिखा है—अङ्गिरा नामक ऋषि था। उसने इन्द्र को पुत्र रूप में पाने की याचना करते हुए आत्म-ध्यान किया। उसके योगैश्वर्य के बल से उसी ध्यान के फलस्वरूप उसे सव्य नाम से इन्द्र पुत्र रूप में प्राप्त हुआ। उसे इन्द्र मेष का रूप धारण करके हर ले गया। यह कथा देकर वे कहते हैं कि इसी इतिहास को बतानेवाली प्रस्तुत ऋचा है, जिसमें मेषरूपधारी इन्द्र की स्तुति की गयी है। किन्तु यह घटना वास्तविक नहीं है। मन्त्र का ऋषि आङ्गिरस सव्य है, और मन्त्र में इन्द्र को मेष कहा गया है, यही देखकर उक्त कथा रच ली गयी है ॥ सायण ने पहले मेष शब्द को तुदादिगण की स्पर्धार्थक मिष धातु से निष्पन्न मानकर ‘मेष’ का यौगिक अर्थ ‘शत्रुओं से स्पर्धा करनेवाला’ करके भी फिर वैकल्पिक रूप से यह इतिहास भी दे दिया है कि—कण्व का पुत्र मेधातिथि यज्ञ कर रहा था, तब इन्द्र मेष का रूप धरकर आया और उसने उसका सोमरस पी लिया। तब ऋषि ने उसे मेष कहा था, इसलिए अब भी इन्द्र को मेष कहते हैं। यह कथा भी काल्पनिक है, वास्तव में घटित किसी इतिहास का वर्णन इस मन्त्र में नहीं है, यह सुधीजन समझ लें ॥
Subject
अगले मन्त्र में यह विषय है कि वाणियों द्वारा जगदीश्वर और राजा की सबको अर्चना करनी चाहिए।