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Samveda Mantra 37

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- शंयुर्बार्हस्पत्यः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
बृ꣣ह꣡द्भि꣢रग्ने अ꣣र्चि꣡भिः꣢ शु꣣क्रे꣡ण꣢ देव शो꣣चि꣡षा꣢ । भ꣣र꣡द्वा꣢जे समिधा꣣नो꣡ य꣢विष्ठ्य रे꣣व꣡त्पा꣢वक दीदिहि ॥३७॥

बृ꣣ह꣡द्भिः꣢ । अ꣣ग्ने । अ꣣र्चिभिः꣢ । शु꣣क्रे꣡ण꣢ । दे꣣व । शोचि꣡षा꣢ । भ꣣र꣡द्वा꣢जे । भ꣣र꣢त् । वा꣣जे । समिधानः꣢ । सम्꣣ । इधानः꣢ । य꣣विष्ठ्य । रेव꣢त् । पा꣣वक । दीदिहि ॥३७॥

Mantra without Swara
बृहद्भिरग्ने अर्चिभिः शुक्रेण देव शोचिषा । भरद्वाजे समिधानो यविष्ठ्य रेवत्पावक दीदिहि ॥

बृहद्भिः । अग्ने । अर्चिभिः । शुक्रेण । देव । शोचिषा । भरद्वाजे । भरत् । वाजे । समिधानः । सम् । इधानः । यविष्ठ्य । रेवत् । पावक । दीदिहि ॥३७॥

Samveda - Mantra Number : 37
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 4;

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1 Bhashyas
Meaning
हे (यविष्ठ्य) अतिशय युवा, (पावक) पवित्रकर्ता, (देव) दाता (अग्ने) तेजस्वी परमेश्वर ! (बृहद्भिः) महान् (अर्चिभिः) तेजों से, और (शुक्रेण) शुद्ध (शोचिषा) ज्ञान-प्रकाश से (भरद्वाजे) अपने आत्मा में बल भरनेवाले पुरुषार्थप्रिय मुझ स्तोता के अन्दर अथवा बल एवं उत्साह से सम्पन्न मेरे मन के अन्दर (समिधानः) प्रकाशित होते हुए आप (रेवत्) समृद्धिपूर्वक (दीदिहि) देदीप्यमान हों ॥३॥
Essence
मनुष्यों को पुरुषार्थी होकर ही परमेश्वर का आह्वान करना चाहिए। अकर्मण्य की प्रार्थना वह नहीं सुनता ॥३॥
Subject
अगले मन्त्र में पुनः परमात्मा से प्रार्थना की गयी है।