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Samveda Mantra 363

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
उ꣣क्थ꣡मिन्द्रा꣢꣯य꣣ श꣢ꣳस्यं꣣ व꣡र्ध꣢नं पुरुनि꣣ष्षि꣡धे꣢ । श꣣क्रो꣡ यथा꣢꣯ सु꣣ते꣡षु꣢ नो रा꣣र꣡ण꣢त्स꣣ख्ये꣡षु꣢ च ॥३६३॥

उ꣣क्थ꣢म् । इ꣡न्द्रा꣢꣯य । शँ꣡स्य꣢꣯म् । व꣡र्ध꣢꣯नम् । पु꣣रुनि꣣ष्षि꣡धे꣢ । पु꣣रु । निष्षि꣡धे꣢ । श꣣क्रः꣢ । य꣡था꣢꣯ । सु꣣ते꣡षु꣢ । नः꣣ । रार꣡ण꣢त् । स꣣ख्ये꣡षु꣢ । स꣣ । ख्ये꣡षु꣢꣯ । च꣣ ॥३६३॥

Mantra without Swara
उक्थमिन्द्राय शꣳस्यं वर्धनं पुरुनिष्षिधे । शक्रो यथा सुतेषु नो रारणत्सख्येषु च ॥

उक्थम् । इन्द्राय । शँस्यम् । वर्धनम् । पुरुनिष्षिधे । पुरु । निष्षिधे । शक्रः । यथा । सुतेषु । नः । रारणत् । सख्येषु । स । ख्येषु । च ॥३६३॥

Samveda - Mantra Number : 363
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 2;

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Meaning
हमें पुत्र, स्त्री, मित्र आदियों सहित (पुरुनिष्षिधे) बहुतों को पाप-पंक से अथवा संकट से उबारनेवाले (इन्द्राय) परम उपदेशक परमात्मा के लिए, ऐसा (उक्थम्) स्तोत्र (शंस्यम्) गान करना चाहिए, जो (वर्धनम्) हम स्तोताओं को बढ़ानेवाला हो, (यथा) जिससे (शक्रः) वह सर्वशक्तिमान् परमात्मा (नः) हम स्तोताओं के (सुतेषु) पुत्रों को (सख्येषु च) और सखाओं को (रारणत्) अतिशय पुनः-पुनः प्रेरणात्मक उपदेश देता रहे ॥४॥
Essence
स्तुति किया हुआ परमेश्वर स्तोताजनों को और उनके स्तोता पुत्र, मित्र आदि को पुरुषार्थ आदि की शुभ प्रेरणा और सदुपदेश देकर उनकी उन्नति करता है ॥४॥
Subject
अगले मन्त्र में यह विषय है कि किस प्रयोजन से कैसा स्तोत्र इन्द्र के लिए उच्चारण करना चाहिए।

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