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Samveda Mantra 360

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- प्रियमेध आङ्गिरसः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
प्र꣡प्र꣢ वस्त्रि꣣ष्टु꣢भ꣣मि꣡षं꣢ व꣣न्द꣡द्वी꣢रा꣣ये꣡न्द꣢वे । धि꣣या꣡ वो꣢ मे꣣ध꣡सा꣢तये꣣ पु꣢र꣣न्ध्या꣡ वि꣢वासति ॥३६०॥

प्र꣡प्र꣢꣯ । प्र । प्र꣣ । वः । त्रिष्टु꣢भ꣢म् । त्रि꣣ । स्तु꣡भ꣢꣯म् । इ꣡ष꣢꣯म् । व꣣न्दद्वी꣡रा꣣य । व꣣न्द꣢त् । वी꣣राय । इ꣡न्द꣢꣯वे । धि꣣या꣢ । वः꣣ । मेध꣡सा꣢तये । मे꣣ध꣢ । सा꣣तये । पु꣡र꣢꣯न्ध्या । पु꣡र꣢꣯म् । ध्या꣣ । आ꣢ । वि꣣वासति । ॥३६०॥

Mantra without Swara
प्रप्र वस्त्रिष्टुभमिषं वन्दद्वीरायेन्दवे । धिया वो मेधसातये पुरन्ध्या विवासति ॥

प्रप्र । प्र । प्र । वः । त्रिष्टुभम् । त्रि । स्तुभम् । इषम् । वन्दद्वीराय । वन्दत् । वीराय । इन्दवे । धिया । वः । मेधसातये । मेध । सातये । पुरन्ध्या । पुरम् । ध्या । आ । विवासति । ॥३६०॥

Samveda - Mantra Number : 360
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 2;

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1 Bhashyas
Meaning
हे साथियो ! (वः) तुम लोग (वन्दद्वीराय) वीरजनों से वन्दित (इन्दवे) तेजस्वी, स्नेह की वर्षा करनेवाले और चन्द्रमा के समान आह्लादकारी इन्द्र परमात्मा के लिए (त्रिष्टुभम्) आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक इन तीनों सुखों को स्थिर करानेवाली अथवा ज्ञान, कर्म और उपासना इन तीन से स्थिर होनेवाली (इषम्) प्रीति और श्रद्धा को (प्र प्र) प्रकृष्टरूप से समर्पित करो, समर्पित करो। प्रीति और श्रद्धा से पूजित वह (मेधसातये) योगयज्ञ की पूर्णता के लिए (पुरन्ध्या) पूर्णता प्रदान करनेवाली (धिया) ऋतम्भरा प्रज्ञा से (आ विवासति) सत्कृत अर्थात् संयुक्त करता है ॥१॥
Essence
वीरजन भी अपनी विजय का कारण परमात्मा को ही मानते हुए जिस परमात्मा की बार-बार वन्दना करते हैं, उसकी सभी लोग प्रीति और श्रद्धा के साथ वन्दना क्यों न करें ॥१॥
Subject
प्रथम मन्त्र में यह विषय है कि स्तुति किया हुआ परमेश्वर क्या करता है।