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Samveda Mantra 357

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- शंयुर्बार्हस्पत्यः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
त्य꣡मु꣢ वो꣣ अ꣡प्र꣢हणं गृणी꣣षे꣡ शव꣢꣯स꣣स्प꣡ति꣢म् । इ꣡न्द्रं꣢ विश्वा꣣सा꣢हं꣣ न꣢र꣣ꣳ श꣡चि꣢ष्ठं वि꣣श्व꣡वे꣢दसम् ॥३५७॥

त्य꣢म् । उ꣣ । वः । अ꣡प्र꣢꣯हणम् । अ । प्र꣣हणम् । गृणीषे꣢ । श꣡व꣢꣯सः । प꣡ति꣢꣯म् । इ꣡न्द्र꣢꣯म् । विश्वा꣣सा꣡ह꣢म् । वि꣣श्वा । सा꣡ह꣢꣯म् । न꣡र꣢꣯म् । श꣡चि꣢꣯ष्ठम् । वि꣣श्व꣡वे꣢दसम् । वि꣣श्व꣢ । वे꣣दसम् ॥३५७॥

Mantra without Swara
त्यमु वो अप्रहणं गृणीषे शवसस्पतिम् । इन्द्रं विश्वासाहं नरꣳ शचिष्ठं विश्ववेदसम् ॥

त्यम् । उ । वः । अप्रहणम् । अ । प्रहणम् । गृणीषे । शवसः । पतिम् । इन्द्रम् । विश्वासाहम् । विश्वा । साहम् । नरम् । शचिष्ठम् । विश्ववेदसम् । विश्व । वेदसम् ॥३५७॥

Samveda - Mantra Number : 357
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 1;

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1 Bhashyas
Meaning
हे प्रजाजनो ! मैं (वः) तुम्हारे व अपने हितार्थ (त्यम् उ) उस, (अप्रहणम्) किसी से न मारे जा सकने योग्य अथवा अन्याय से किसी को न मारनेवाले, (शवसः पतिम्) बल और सेना के अधिपति, (विश्वासाहम्) सब शत्रुओं वा विघ्नों को परास्त करनेवाले, (नरम्) नेता, (शचिष्ठम्) अतिशय कर्मनिष्ठ, (विश्ववेदसम्) ब्रह्माण्ड वा राष्ट्र के सब घटनाचक्र को जाननेवाले (इन्द्रम्) शूरवीर परमात्मा वा राजा की (गृणीषे) गुण-कर्मों के वर्णन द्वारा स्तुति करता हूँ ॥६॥
Essence
जो प्रजाओं का हित चाहते हैं उन मन्त्री, पुरोहित आदियों को चाहिए कि मन्त्रोक्त गुणों से अलङ्कृत जगदीश्वर का गुण-कर्मों के कीर्तन द्वारा और उसकी गरिमा के गान द्वारा सर्वत्र प्रचार करें और वैसे ही गुणी राजा को उसके गुणों के वर्णन द्वारा कर्तव्य के प्रति प्रोत्साहित करें ॥६॥
Subject
अगले मन्त्र में यह वर्णन है कि इन्द्रपदवाच्य परमात्मा और राजा कैसा है।