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Samveda Mantra 342

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
गा꣡य꣢न्ति त्वा गाय꣣त्रि꣡णोऽर्च꣢꣯न्त्य꣣र्क꣢म꣣र्कि꣡णः꣢ । ब्र꣣ह्मा꣡ण꣢स्त्वा शतक्रत꣣ उ꣢द्व꣣ꣳश꣡मि꣢व येमिरे ॥३४२॥

गा꣡य꣢꣯न्ति । त्वा꣣ । गायत्रि꣡णः꣢ । अ꣡र्च꣢꣯न्ति । अ꣣र्क꣢म् । अ꣣र्कि꣡णः꣢ । ब्र꣣ह्मा꣡णः꣢ । त्वा꣣ । शतक्रतो । शत । क्रतो । उ꣢त् । वँ꣣श꣢म् । इ꣣व । येमिरे ॥३४२॥

Mantra without Swara
गायन्ति त्वा गायत्रिणोऽर्चन्त्यर्कमर्किणः । ब्रह्माणस्त्वा शतक्रत उद्वꣳशमिव येमिरे ॥

गायन्ति । त्वा । गायत्रिणः । अर्चन्ति । अर्कम् । अर्किणः । ब्रह्माणः । त्वा । शतक्रतो । शत । क्रतो । उत् । वँशम् । इव । येमिरे ॥३४२॥

Samveda - Mantra Number : 342
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 12;

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Meaning
हे (शतक्रतो) बहुत बुद्धिमान् तथा बहुत कर्मों को करनेवाले परमैश्वर्यवान् परमात्मन् ! (गायत्रिणः) सामगान करनेवाले गायक जन अथवा यज्ञ के उद्गाता नामक ऋत्विज् (त्वा) तेरा (गायन्ति) गान करते हैं। (अर्किणः) वेदमन्त्रार्थों का अध्ययन करनेवाले जन अथवा पूजक होता और अध्वर्यु नामक ऋत्विज् (त्वा) तेरी (अर्चन्ति) स्तुति करते हैं। (ब्राह्मणाः) ब्रह्मोपासक ब्राह्मण अथवा यज्ञ के ब्रह्मा नामक ऋत्विज् (त्वा) तुझे (वंशम् इव) ध्वजदण्ड के समान (उद्येमिरे) ऊपर उठाते हैं, अर्थात् जैसे पताकाधारी लोग पताका के डण्डे को ऊँचा उठाकर आकाश में पताका को फहराते हैं, वैसे ही ब्राह्मण जन और यज्ञ के ब्रह्मा लोग तेरी कीर्ति को सर्वत्र फहराते हैं ॥१॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। ‘गाय, गाय’ में यमक है। द्वितीय पाद में अनुप्रास है ॥१॥
Essence
मनुष्यों को चाहिए कि साङ्गोपाङ्ग वेदों को पढ़कर, यज्ञ आदि में मन्त्रोच्चारणपूर्वक और सामगानसहित परमेश्वर की अर्चना करते हुए उसकी महिमा को गगन में ऊँची उठायी हुई, हवा से लहराती हुई ध्वजा के समान सर्वत्र प्रसारित करें ॥१॥
Subject
प्रथम मन्त्र में यह विषय है कि इन्द्र की महिमा का सब गान करते हैं।