Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Samveda Mantra 340

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
आ꣢ त्वा꣣ स꣡खा꣢यः स꣣ख्या꣡ व꣢वृत्युस्ति꣣रः꣢ पु꣣रू꣡ चि꣢दर्ण꣣वां꣡ ज꣢गम्याः । पि꣣तु꣡र्नपा꣢꣯त꣣मा꣡ द꣢धीत वे꣣धा꣡ अ꣣स्मि꣡न्क्षये꣢꣯ प्रत꣣रां꣡ दीद्या꣢꣯नः ॥३४०॥

आ꣢ । त्वा꣣ । स꣡खा꣢꣯यः । स । खा꣣यः । सख्या꣢ । स꣣ । ख्या꣢ । व꣣वृत्युः । तिरः꣢ । पु꣣रु꣢ । चि꣣त् । अर्णवा꣢न् । ज꣣गम्याः । पितुः꣢ । न꣡पा꣢꣯तम् । आ । द꣣धीत । वेधाः꣢ । अ꣣स्मि꣢न् । क्ष꣡ये꣢꣯ । प्र꣣तरा꣢म् । दी꣡द्या꣢꣯नः । ॥३४०॥

Mantra without Swara
आ त्वा सखायः सख्या ववृत्युस्तिरः पुरू चिदर्णवां जगम्याः । पितुर्नपातमा दधीत वेधा अस्मिन्क्षये प्रतरां दीद्यानः ॥

आ । त्वा । सखायः । स । खायः । सख्या । स । ख्या । ववृत्युः । तिरः । पुरु । चित् । अर्णवान् । जगम्याः । पितुः । नपातम् । आ । दधीत । वेधाः । अस्मिन् । क्षये । प्रतराम् । दीद्यानः । ॥३४०॥

Samveda - Mantra Number : 340
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 11;

Bhashya

More bhashyas
Meaning
हे इन्द्र परमेश्वर ! (सखायः) आपके सखा स्तोता लोग सदा ही (त्वा) आपको (सख्या) सखिभाव से (आ ववृत्युः) स्वीकार करें। (तिरः) उनको प्राप्त होकर आप (पुरु चित्) बहुत अधिक (अर्णवान्) आनन्द के सागरों को (जगम्याः) प्राप्त कराओ। (वेधाः) स्तुति और पुरुषार्थ का कर्ता वह आपका सखा (अस्मिन् क्षये) इस घर में, गृहस्थाश्रम में (प्रतराम्) अत्यधिक (दीद्यानः) तेज और यश से प्रदीप्त होता हुआ (पितुः) अपने पिता के, वैसे ही तेजस्वी और यशस्वी (नपातम्) पौत्र को अर्थात् अपने पुत्र को (आदधीत) उत्पन्न करे ॥९॥
Essence
जो जगदीश्वर से मित्रता जोड़ता है, उसे वह आनन्द-सागर में निमग्न कर देता है। जगदीश्वर का वह सखा शास्त्रोक्त विधि से गृहस्थाश्रम का पालन करता हुआ अपने अनुरूप तेजस्वी और यशस्वी पुत्र का पिता बनता है ॥९॥
Subject
अगले मन्त्र में इन्द्र की मित्रता का विषय है।

We are thankful to https://vedicscriptures.in for providing us a substantial amount of data for this section of the Vedas.