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Samveda Mantra 333

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- भरद्वाजः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
त्रा꣣ता꣢र꣣मि꣡न्द्र꣢मवि꣣ता꣢र꣣मि꣢न्द्र꣣ꣳ ह꣡वे꣢हवे सु꣣ह꣢व꣣ꣳ शू꣢र꣣मि꣡न्द्र꣢म् । हु꣣वे꣢꣫ नु श꣣क्रं꣡ पु꣢रुहू꣣त꣡मिन्द्र꣢꣯मि꣣द꣢ꣳ ह꣣वि꣢र्म꣣घ꣡वा꣢ वे꣣त्वि꣡न्द्रः꣢ ॥३३३॥

त्रा꣣ता꣡र꣢म् । इ꣡न्द्र꣢꣯म् । अ꣣विता꣡र꣢म् । इ꣡न्द्र꣢꣯म् । ह꣡वे꣢꣯हवे । ह꣡वे꣢꣯ । ह꣣वे । सुह꣡व꣢म् । सु꣣ । हव꣢꣯म् । शू꣡र꣢꣯म् । इ꣡न्द्र꣢꣯म् । हु꣣वे꣢ । नु । श꣣क्र꣢म् । पु꣣रुहूत꣢म् । पु꣣रु । हूत꣢म् । इ꣡न्द्र꣢꣯म् । इ꣣द꣢म् । ह꣣विः꣢ । म꣣घ꣡वा꣢ । वे꣣तु । इ꣡न्द्रः꣢꣯ ॥३३३॥

Mantra without Swara
त्रातारमिन्द्रमवितारमिन्द्रꣳ हवेहवे सुहवꣳ शूरमिन्द्रम् । हुवे नु शक्रं पुरुहूतमिन्द्रमिदꣳ हविर्मघवा वेत्विन्द्रः ॥

त्रातारम् । इन्द्रम् । अवितारम् । इन्द्रम् । हवेहवे । हवे । हवे । सुहवम् । सु । हवम् । शूरम् । इन्द्रम् । हुवे । नु । शक्रम् । पुरुहूतम् । पुरु । हूतम् । इन्द्रम् । इदम् । हविः । मघवा । वेतु । इन्द्रः ॥३३३॥

Samveda - Mantra Number : 333
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 11;

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1 Bhashyas
Meaning
मैं (त्रातारम्) आपत्तियों से त्राण करनेवाले (इन्द्रम्) शत्रुविदारक जगदीश्वर वा राजा को (अवितारम्) सुखादि के प्रदान द्वारा पालना करनेवाले (इन्द्रम्) ऐश्वर्यशाली जगदीश्वर वा राजा को, (हवे हवे) प्रत्येक संग्राम में, प्रत्येक संकट में (सुहवम्) सरलता से पुकारने योग्य (शक्रम्) शक्तिशाली, (पुरुहूतम्) बहुत स्तुति किये गये अथवा बहुतों से बुलाये गये (इन्द्रम्) अविद्या, दुःख आदि के भञ्जक जगदीश्वर वा राजा को (नु) शीघ्र ही (हुवे) पुकारता हूँ। (सः) वह (मघवा) प्रशस्त धनवाला (इन्द्रः) जगदीश्वर वा राजा (इदम्) इस मेरे द्वारा दी जाती हुई (हविः) आत्मसमर्पण रूप अथवा राजकर रूप हवि को (वेतु) स्वीकार करे ॥२॥ इस मन्त्र में अर्थश्लेष अलङ्कार है, विशेषणों के साभिप्राय होने से परिकरालङ्कार भी है। इन्द्र शब्द की चार बार पुनरुक्ति उसकी बहुक्षमता को तथा अन्यों से विलक्षण आह्वानयोग्यता को द्योतित करती है। निरर्थक ‘तारमिन्द्रं’ की दो बार, ‘रमिन्द्रं’ की तीन बार, ‘मिन्द्र’ की चार बार आवृत्ति होने से यमक अलङ्कार है। इसी प्रकार ‘हवे, हवे, हवं, हवं हुवे, हवि’ में वृत्त्यनुप्रास है। ‘त्रातारम्, अवितारम्,’ में और ‘इन्द्रम्, शक्रम्, पुरुहूतम्’ में पुनरुक्तवदाभास है ॥२॥
Essence
सबको चाहिए कि विपत्त्राता, शुभ पालनकर्त्ता, सुख से आह्वान किये जाने योग्य, अनेक जनों से वन्दित, शूर परमेश्वर तथा राजा का आत्मकल्याण और जनकल्याण के लिए वरण करें। साथ ही परमेश्वर को आत्म-समर्पण और राजा को कर-प्रदान भी नियम से करना चाहिए ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में परमात्मा और राजा आह्वान करने योग्य हैं, यह इन्द्र नाम से दर्शाया गया है।