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Samveda Mantra 328

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
प्र꣡ वो꣢ म꣣हे꣡ म꣢हे꣣वृ꣡धे꣢ भरध्वं꣣ प्र꣡चे꣢तसे꣣ प्र꣡ सु꣢म꣣तिं꣡ कृ꣢णुध्वम् । वि꣡शः꣢ पू꣣र्वीः꣡ प्र च꣢꣯र चर्षणि꣣प्राः꣢ ॥३२८॥

प्र꣢ । वः꣣ । महे꣢ । म꣣हेवृ꣡धे꣢ । म꣣हे । वृ꣡धे꣢꣯ । भ꣣रध्वम् । प्र꣡चे꣢꣯तसे । प्र । चे꣣तसे । प्र꣢ । सु꣣मति꣢म् । सु꣣ । मति꣢म् । कृ꣣णुध्वम् । वि꣡शः꣢꣯ । पू꣣र्वीः꣢ । प्र । च꣣र । चर्षणिप्राः꣢ । चर्षणि । प्राः꣢ ॥३२८॥

Mantra without Swara
प्र वो महे महेवृधे भरध्वं प्रचेतसे प्र सुमतिं कृणुध्वम् । विशः पूर्वीः प्र चर चर्षणिप्राः ॥

प्र । वः । महे । महेवृधे । महे । वृधे । भरध्वम् । प्रचेतसे । प्र । चेतसे । प्र । सुमतिम् । सु । मतिम् । कृणुध्वम् । विशः । पूर्वीः । प्र । चर । चर्षणिप्राः । चर्षणि । प्राः ॥३२८॥

Samveda - Mantra Number : 328
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 10;

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Meaning
साथियों ! (वः) तुम (महेवृधे) जो तेज के लिए मनुष्यों को बढ़ाता है ऐसे, (महे) पूजनीय इन्द्र जगदीश्वर के लिए (प्र भरध्वम्) पूजा का उपहार हेलाओ। (प्रचेतसे) श्रेष्ठ ज्ञानवाले उसके लिए (सुमतिम्) श्रेष्ठ स्तुति को (प्रकृणुध्वम्) श्रेष्ठ रूप से करो। हे इन्द्र परमात्मन् ! (चर्षणिप्राः) मनुष्यों को पूर्ण करनेवाले आप (पूर्वीः) श्रेष्ठ (विशः) प्रजाओं को (प्र चर) धन, धान्य, गुणों आदि से पूर्ण करने के लिए प्राप्त होवो ॥६॥ इस मन्त्र में ‘महे, महे’ में यमक अलङ्कार है। ‘प्र’ की पाँच बार आवृत्ति होने से वृत्त्यनुप्रास और ‘ध्वम्, ध्वम्’ तथा ‘चर, चर्’ में छेकानुप्रास है ॥६॥
Essence
पूजा के बहुमूल्य उपहार से सत्कृत किया गया महामहिमाशाली जगदीश्वर स्तोताओं को विविध आध्यात्मिक और भौतिक ऐश्वर्यों से भरपूर कर देता है ॥६॥
Subject
अगले मन्त्र में पुनः परमात्मा की स्तुति का विषय है।

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