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Samveda Mantra 325

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- बृहदुक्थ्यो वामदेव्यः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
वि꣣धुं꣡ द꣢द्रा꣣ण꣡ꣳ सम꣢꣯ने बहू꣣ना꣡ꣳ युवा꣢꣯न꣣ꣳ स꣡न्तं꣢ पलि꣣तो꣡ ज꣢गार । दे꣣व꣡स्य꣢ पश्य꣣ का꣡व्यं꣢ महि꣣त्वा꣢꣫द्या म꣣मा꣢र꣣ स꣡ ह्यः समा꣢꣯न ॥३२५॥

वि꣣धु꣢म् । वि꣣ । धु꣢म् । द꣣द्राण꣢म् । स꣡म꣢꣯ने । सम् । अ꣣ने । बहूना꣢म् । यु꣡वा꣢꣯नम् । स꣡न्त꣢꣯म् । प꣣लितः꣢ । ज꣣गार । देव꣡स्य꣢ । प꣣श्य । का꣡व्य꣢꣯म् । म꣣हित्वा꣢ । अ꣣द्या꣢ । अ꣣ । द्य꣢ । म꣣मा꣡र꣢ । सः । ह्यः । सम् । आ꣣न ॥३२५॥

Mantra without Swara
विधुं दद्राणꣳ समने बहूनाꣳ युवानꣳ सन्तं पलितो जगार । देवस्य पश्य काव्यं महित्वाद्या ममार स ह्यः समान ॥

विधुम् । वि । धुम् । दद्राणम् । समने । सम् । अने । बहूनाम् । युवानम् । सन्तम् । पलितः । जगार । देवस्य । पश्य । काव्यम् । महित्वा । अद्या । अ । द्य । ममार । सः । ह्यः । सम् । आन ॥३२५॥

Samveda - Mantra Number : 325
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 10;

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1 Bhashyas
Meaning
प्रथम—चन्द्र-सूर्य के पक्ष में। (समने) अन्धकार के साथ युद्ध में (बहूनाम्) बहुत से अन्धकार-रूप शत्रुओं के (दद्राणम्) विदारणकर्त्ता (विधुम्) चन्द्रमा को (युवानं सन्तम्) युवक होते हुए अर्थात् पूर्णिमा में पूर्ण प्रकाशमान होते हुए को भी (पलितः) बूढ़े, पके हुए किरणरूप केशोंवाले सूर्य ने (जगार) निगल लिया है, अर्थात् पूर्णिमा के बीत जाने पर प्रतिपदा तिथि से आरम्भ करके धीरे-धीरे एक-एक कला को निगलते-निगलते अमावस्या को पूर्ण रूप से निगल लिया है। (देवस्य) क्रीडा करनेवाले परमेश्वर के (महित्वा) महान् (काव्यम्) जगत्-रूप दृश्य काव्य को (पश्य) देखो। इसमें जो (ह्यः) कल (समान) धारण किए हुए था, जीवित था, (सः) वह (अद्य) आज (ममार) मर जाता है ॥ चन्द्रमा सूर्य के प्रकाश से प्रकाशित होता है। पृथिवी के चारों ओर चन्द्रमा के परिभ्रमण करने के कारण उसका जितना भाग पृथिवी की ओट में आ जाता है, उतने पर सूर्य का प्रकाश नहीं पहुँचता, अतः वह अप्रकाशित ही रहता है। अमावस्या को चन्द्रमा और सूर्य के बीच में पृथिवी के आ जाने से सूर्य की किरणें चन्द्रमा पर बिल्कुल नहीं पड़ती हैं, इस कारण उस रात चन्द्रमा बिल्कुल दिखाई नहीं देता। उसी को यहाँ वेदकाव्य के कवि ने इस रूप में वर्णित किया है कि सूर्य चन्द्रमा को निगल लेता है ॥ द्वितीय—अध्यात्म-पक्ष में। (समने) प्राणवान् शरीर में (बहूनाम्) अनेक ज्ञानेन्द्रियों को (दद्राणम्) अपने-अपने विषयों में प्रेरित करनेवाले (विधुम्) ज्ञान-साधन मन को (युवानं सन्तम्) जाग्रदवस्था में युवा के समान पूर्णशक्तिमान् होते हुए को भी (पलितः) अनादि होने से बूढ़ा आत्मा (जगार) सुषुप्ति अवस्था में निगल लेता है, क्योंकि सुषुप्ति में मन के सब व्यापार शान्त हो जाते हैं। (देवस्य) प्रकाशक आत्मा के (महित्वा) महान् (काव्यम्) जनन, जीवन, मरण आदि-रूप काव्य को (पश्य) देखो। जो (अद्य) आज (ममार) मरा पड़ा है, (सः) वह (ह्यः) कल (समान) प्राण धारण कर रहा था। यह सब आत्मा के ही आवागमन का खेल है। इसी प्रकार आगे भी आत्मा पुनर्जन्म प्राप्त करके देहधारी होकर देह की दृष्टि से जीवित भी होगा, मरेगा भी ॥३॥ इस मन्त्र में ‘अद्य ममार स ह्यः समान’ इस सामान्य का विधु-निगरणरूप विशेष अर्थ द्वारा समर्थन होने से अर्थान्तरन्यास अलङ्कार है। ‘युवक को बूढ़े ने निगल लिया’ इसमें विरूपसंघटनारूप विषमालङ्कार है ॥३॥
Essence
इस संसार में शक्तिशालियों की भी मृत्यु निश्चित है, यह मानकर सबको धर्म-कर्मों में मन लगाना चाहिए ॥३॥
Subject
अगले मन्त्र में यह बताया गया है कि जन्मधारियों की मृत्यु निश्चित है।