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Samveda Mantra 32

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
क꣣वि꣢म꣣ग्नि꣡मुप꣢꣯ स्तुहि स꣣त्य꣡ध꣢र्माणमध्व꣣रे꣢ । दे꣣व꣡म꣢मीव꣣चा꣡त꣢नम् ॥३२॥

क꣣वि꣢म् । अ꣣ग्नि꣢म् । उ꣡प꣢꣯ । स्तु꣣हि । स꣣त्य꣡ध꣢र्माणम् । स꣣त्य꣢ । ध꣣र्माणम् । अध्वरे꣢ । दे꣣व꣢म् । अ꣣मीवचा꣡त꣢नम् । अ꣣मीव । चा꣡त꣢꣯नम् ॥३२॥

Mantra without Swara
कविमग्निमुप स्तुहि सत्यधर्माणमध्वरे । देवममीवचातनम् ॥

कविम् । अग्निम् । उप । स्तुहि । सत्यधर्माणम् । सत्य । धर्माणम् । अध्वरे । देवम् । अमीवचातनम् । अमीव । चातनम् ॥३२॥

Samveda - Mantra Number : 32
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 3;

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1 Bhashyas
Meaning
प्रथम—परमेश्वर के पक्ष में। हे मनुष्य, तू (अध्वरे) हिंसादिरहित जीवनयज्ञ में (कविम्) वेदकाव्य के कवि एवं क्रान्तदर्शी, (सत्यधर्माणम्) सत्य गुण-कर्म-स्वभाववाले, (देवम्) सुख आदि के दाता, (अमीवचातनम्) अज्ञान आदि तथा व्याधि, स्त्यान, संशय, प्रमाद, आलस्य आदि योगविघ्नकारी मानस रोगों को विनष्ट करनेवाले (अग्निम्) तेजस्वी परमेश्वर की (उप स्तुहि) उपासना कर ॥ द्वितीय—भौतिक अग्नि के पक्ष में। हे मनुष्य, तू (अध्वरे) शिल्पयज्ञ में (कविम्) गतिमान्, (सत्यधर्माणम्) सत्य गुण-कर्म-स्वभाववाले, (देवम्) प्रकाशमान, प्रकाशक और व्यवहार-साधक, (अमीवचातनम्) ज्वरादि रोगों को नष्ट करनेवाले, (अग्निम्) आग, बिजली और सूर्य के (उप स्तुहि) गुणों का वर्णन कर ॥१२॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥१२॥
Essence
मनुष्यों को शिल्पविद्या की सिद्धि के लिए जैसे भौतिक आग, बिजली और सूर्य का गुणज्ञानपूर्वक सेवन करना चाहिए, वैसे ही धर्म-प्राप्ति के लिए परमेश्वर के गुण-कर्म-स्वभाव का ज्ञान, वर्णन और अनुकरण करना चाहिए ॥१२॥
Subject
भौतिक अग्नि के समान परमेश्वर के भी गुण सबके जानने योग्य हैं, यह कहते हैं।