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Samveda Mantra 313

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
अ꣡सा꣢वि दे꣣वं꣡ गोऋ꣢꣯जीक꣣म꣢न्धो꣣꣬ न्य꣢꣯स्मि꣢न्नि꣡न्द्रो꣢ ज꣣नु꣡षे꣢मुवोच । बो꣡धा꣢मसि त्वा हर्यश्व यज्ञै꣣र्बो꣡धा꣢꣯ न꣣ स्तो꣢म꣣म꣡न्ध꣢सो꣣ म꣡दे꣢षु ॥३१३॥

अ꣡सा꣢꣯वि । दे꣣व꣢म् । गो꣡ऋजी꣢꣯कम् । गो । ऋ꣣जीकम् । अ꣡न्धः꣢꣯ । नि । अ꣣स्मिन् । इ꣡न्द्रः꣢꣯ । ज꣣नु꣡षा꣢ । ई꣣म् । उवोच । बो꣡धा꣢꣯मसि । त्वा꣣ । हर्यश्व । हरि । अश्व । यज्ञैः꣢ । बो꣡ध꣢꣯ । नः꣣ । स्तो꣡म꣢꣯म् । अ꣡न्ध꣢꣯सः । म꣡दे꣢꣯षु ॥३१३॥

Mantra without Swara
असावि देवं गोऋजीकमन्धो न्यस्मिन्निन्द्रो जनुषेमुवोच । बोधामसि त्वा हर्यश्व यज्ञैर्बोधा न स्तोममन्धसो मदेषु ॥

असावि । देवम् । गोऋजीकम् । गो । ऋजीकम् । अन्धः । नि । अस्मिन् । इन्द्रः । जनुषा । ईम् । उवोच । बोधामसि । त्वा । हर्यश्व । हरि । अश्व । यज्ञैः । बोध । नः । स्तोमम् । अन्धसः । मदेषु ॥३१३॥

Samveda - Mantra Number : 313
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 9;

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1 Bhashyas
Meaning
हमारे द्वारा (देवम्) दीप्तियुक्त, तेजस्वी, (गोऋजीकम्) इन्द्रियरूप गौओं की सरलगामिता में हेतुभूत (अन्धः) श्रद्धारस (असावि) अभिषुत कर लिया गया है। (अस्मिन्) इसमें (इन्द्रः) परमेश्वर (जनुषा ईम्) स्वभावतः ही (नि उवोच) अतिशय संबद्ध हो गया है। हे (हर्यश्व) वेगवान् भूमि, चन्द्र, विद्युत् आदि व्याप्त पदार्थों के स्वामी परमात्मन् ! हम (यज्ञैः) योगाभ्यासरूप यज्ञों से (त्वा) आपको (बोधामसि) जानते हैं, आप (अन्धसः) आनन्द रस की (मदेषु) तृप्तियों में (नः) हमें बोध जानिये ॥१॥ इस मन्त्र में इन्द्र तथा उसके स्तोताओं द्वारा परस्पर एक बोधनरूप क्रिया किये जाने का वर्णन होने से अन्योन्य अलङ्कार है। ‘बोधा’ की एक बार आवृत्ति में यमक तथा ‘मन्धो, मन्ध’ में छेकानुप्रास है ॥१॥
Essence
परमेश्वर की उपासना से योगाभ्यासी मनुष्य की इन्द्रियाँ सरल मार्ग पर चलनेवाली हो जाती हैं। इसलिए सबको श्रद्धापूर्वक परमेश्वर की अर्चना करनी चाहिए ॥१॥
Subject
प्रथम मन्त्र में परमेश्वर को श्रद्धारस अर्पण करने का वर्णन है।