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Samveda Mantra 31

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- प्रस्कण्वः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
उ꣢दु꣣ त्यं꣢ जा꣣त꣡वे꣢दसं दे꣣वं꣡ व꣢हन्ति के꣣त꣡वः꣢ । दृ꣣शे꣡ विश्वा꣢꣯य꣣ सू꣡र्य꣢म् ॥३१॥

उ꣢त् । उ꣣ । त्य꣢म् । जा꣣त꣡वे꣢दसम् । जा꣣त꣢ । वे꣣दसम् । देव꣢म् । व꣣हन्ति । केत꣡वः꣢ । दृ꣣शे꣢ । वि꣡श्वा꣢꣯य । सू꣡र्य꣢꣯म् ॥३१॥

Mantra without Swara
उदु त्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतवः । दृशे विश्वाय सूर्यम् ॥

उत् । उ । त्यम् । जातवेदसम् । जात । वेदसम् । देवम् । वहन्ति । केतवः । दृशे । विश्वाय । सूर्यम् ॥३१॥

Samveda - Mantra Number : 31
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 3;

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1 Bhashyas
Meaning
प्रथम—सूर्य के पक्ष में। (केतवः) किरणें (त्यम्) उस प्रसिद्ध, (जातवेदसम्) उत्पन्न पदार्थों को प्रकाशित करनेवाले, (देवम्) प्रकाशमान, प्रकाशक, दिन-रात आदि के प्रदाता तथा द्युलोक में स्थित (सूर्यम्) सूर्य-रूप अग्नि को (विश्वाय दृशे) सब प्राणियों के दर्शन के लिए (उद् वहन्ति) पृथिवी आदि लोकों में पहुँचाती हैं, अर्थात् सूर्य ऊपर स्थित हुआ भी किरणों द्वारा सब लोकों में पहुँच जाता है ॥ द्वितीय—परमेश्वर के पक्ष में। (केतवः) जिन्हें ऋतम्भरा प्रज्ञा प्राप्त हो गई है, वे योगी लोग (त्यम्) स्वयं अनुभव किये गये उस प्रसिद्ध, (जातवेदसम्) सर्वज्ञ, सर्वव्यापक, धनों के उत्पादक और ज्ञानप्रदायक, (देवम्) दिव्यगुणप्रदाता (सूर्यम्) सूर्य के सदृश ज्योतिर्मय परमेश्वर-रूप अग्नि को (विश्वाय दृशे) सबके साक्षात्कार के लिए (उद् वहन्ति) सर्वत्र प्रचारित करते हैं ॥११॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। सूर्य और परमेश्वर का उपमानोपमेयभाव व्यंग्य है ॥११॥
Essence
जैसे सूर्य के प्रकाश को उसकी किरणें भूमि आदि लोकों में पहुँचाती हैं, जिससे सब लोग देख सकें, वैसे ही योगी विद्वान् जन परमेश्वर का स्वयं साक्षात्कार करके अन्यों के दर्शनार्थ उसे सर्वत्र प्रचारित करते हैं ॥११॥
Subject
अगले मन्त्र में सूर्य के दृष्टान्त से परमेश्वर विषय का उपदेश है।