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Samveda Mantra 296

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- नोधा गौतमः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
न꣡ त्वा꣢ बृ꣣ह꣢न्तो꣣ अ꣡द्र꣢यो꣣ व꣡र꣢न्त इन्द्र वी꣣ड꣡वः꣢ । य꣡च्छिक्ष꣢꣯सि स्तुव꣣ते꣡ माव꣢꣯ते꣣ व꣢सु꣣ न꣢ कि꣣ष्ट꣡दा मि꣢꣯नाति ते ॥२९६॥

न꣢ । त्वा꣣ । बृह꣡न्तः꣢ । अ꣡द्र꣢꣯यः । अ । द्र꣢यः । व꣡र꣢꣯न्ते । इ꣣न्द्र । वीड꣡वः꣢ । यत् । शि꣡क्ष꣢꣯सि । स्तु꣣वते꣢ । मा꣡व꣢꣯ते । व꣡सु꣢꣯ । न । किः꣣ । तत् । आ । मि꣣नाति । ते ॥२९६॥

Mantra without Swara
न त्वा बृहन्तो अद्रयो वरन्त इन्द्र वीडवः । यच्छिक्षसि स्तुवते मावते वसु न किष्टदा मिनाति ते ॥

न । त्वा । बृहन्तः । अद्रयः । अ । द्रयः । वरन्ते । इन्द्र । वीडवः । यत् । शिक्षसि । स्तुवते । मावते । वसु । न । किः । तत् । आ । मिनाति । ते ॥२९६॥

Samveda - Mantra Number : 296
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 7;

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Meaning
हे (इन्द्र) परमेश्वर ! (बृहन्तः) विशाल (वीडवः) दृढ (अद्रयः) पर्वत भी (त्वा) तुझे (न) नहीं (वरन्त) रोक सकते हैं, (यत्) जब कि तू (मावते) मुझ जैसे (स्तुवते) स्तोता जन के लिए (वसु) आध्यात्मिक और भौतिक धन (शिक्षसि) देता है। (तत्) उस तेरे दानरूप कर्म को (न किः) कोई भी नहीं (आ मिनाति) नष्ट कर सकता है ॥४॥
Essence
परमेश्वर का जो गुण-कर्म-स्वभाव है, उसके फलीभूत होने में संसार की कोई भी बाधा रुकावट नहीं डाल सकती ॥४॥
Subject
अगले मन्त्र में परमेश्वर का दान करने का धर्म वर्णित है।

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