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Samveda Mantra 286

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
यः꣡ स꣢त्रा꣣हा꣡ विच꣢꣯र्षणि꣣रि꣢न्द्रं꣣ त꣡ꣳ हूम꣢हे व꣣य꣢म् । स꣡ह꣢स्रमन्यो तुविनृम्ण सत्पते꣣ भ꣡वा꣢ स꣣म꣡त्सु꣢ नो वृ꣣धे꣢ ॥२८६॥

यः꣢ । स꣣त्राहा꣢ । स꣣त्रा । हा꣢ । वि꣡च꣢꣯र्षणिः । वि । च꣣र्षणिः । इन्द्र꣣म् । तम् । हू꣣महे । वय꣢म् । स꣡ह꣢꣯स्रमन्यो । स꣡ह꣢꣯स्र । म꣣न्यो । तुविनृम्ण । तुवि । नृम्ण । सत्पते । सत् । पते । भ꣡व꣢꣯ । स꣣म꣡त्सु꣢ । स꣣ । म꣡त्सु꣢꣯ । नः꣣ । वृधे꣢ ॥२८६॥

Mantra without Swara
यः सत्राहा विचर्षणिरिन्द्रं तꣳ हूमहे वयम् । सहस्रमन्यो तुविनृम्ण सत्पते भवा समत्सु नो वृधे ॥

यः । सत्राहा । सत्रा । हा । विचर्षणिः । वि । चर्षणिः । इन्द्रम् । तम् । हूमहे । वयम् । सहस्रमन्यो । सहस्र । मन्यो । तुविनृम्ण । तुवि । नृम्ण । सत्पते । सत् । पते । भव । समत्सु । स । मत्सु । नः । वृधे ॥२८६॥

Samveda - Mantra Number : 286
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 6;

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1 Bhashyas
Meaning
(यः) जो परमात्मा वा राजा (सत्राहा) सत्य से असत्य का हनन करनेवाला अथवा सत्य व्यवहार करनेवाला और (विचर्षणिः) विशेष रूप से द्रष्टा है, (तम्) उस (इन्द्रम्) दुःख, विघ्न आदि के विदारक तथा सुख एवं ऐश्वर्य के प्रदाता परमात्मा और राजा को (वयम्) हम प्रजाजन (हूमहे) पुकारते हैं। हे (सहस्रमन्यो) पापों और पापियों के विनाशार्थ अनन्त उत्साह को धारण करनेवाले, (तुविनृम्ण) बहुत बली तथा बहुत धनी, (सत्पते) सज्जनों के पालक ! तू (समत्सु) जीवन के संघषों में एवं देवासुरसंग्रामों में (नः) हमारी (वृधे) वृद्धि के लिए (भव) हो ॥४॥ इस मन्त्र में अर्थश्लेष अलङ्कार है ॥४॥
Essence
जैसे ब्रह्माण्ड में परमेश्वर सत्य का हन्ता, सर्वद्रष्टा, पापों को सहन न करनेवाला, बहुत बलवान्, बहुत धनवान् और देवासुरसंग्रामों में देवपुरुषों को विजय दिलानेवाला तथा बढ़ानेवाला है, वैसे ही राष्ट्र में राजा हो ॥४॥
Subject
अगले मन्त्र में यह कहा गया है कि कैसे परमेश्वर और राजा को हम पुकारें और उससे क्या याचना करें।