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Samveda Mantra 28

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- शुनः शेप आजीगर्तिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
इ꣣म꣢मू꣣ षु꣢꣫ त्वम꣣स्मा꣡क꣢ꣳ स꣣निं꣡ गा꣢य꣣त्रं꣡ नव्या꣢꣯ꣳसम् । अ꣡ग्ने꣢ दे꣣वे꣢षु꣣ प्र꣡ वो꣢चः ॥२८॥

इ꣣म꣢म् । उ꣣ । सु꣢ । त्वम् । अ꣣स्मा꣡क꣢म् । स꣣नि꣢म् । गा꣣यत्र꣢म् । न꣡व्याँ꣢꣯सम् । अ꣡ग्ने꣢꣯ । दे꣣वे꣡षु꣢ । प्र । वो꣣चः ॥२८॥

Mantra without Swara
इममू षु त्वमस्माकꣳ सनिं गायत्रं नव्याꣳसम् । अग्ने देवेषु प्र वोचः ॥

इमम् । उ । सु । त्वम् । अस्माकम् । सनिम् । गायत्रम् । नव्याँसम् । अग्ने । देवेषु । प्र । वोचः ॥२८॥

Samveda - Mantra Number : 28
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 3;

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Meaning
हे (अग्ने) अनन्तविद्यामय जगदीश्वर! (त्वम्) सब मङ्गलों को देनेवाले आप (इमम्) इस, (अस्माकम्) हम मनुष्यों के (सनिम्) बहुत बोधप्रद, (नव्यांसम्) नवीनतर (गायत्रम्) गायत्र्यादि छन्दों से युक्त चारों वेदों का (देवेषु) दिव्यगुणयुक्त विद्वान् ऋषियों के प्रति (सुप्रवोचः) सम्यक्तया सृष्टि के आदि में प्रवचन करते हो ॥८॥
Essence
जगत्पिता, परम कारुणिक परमेश्वर मनुष्यों के कर्त्तव्यबोध के लिए सृष्टि के आदि में महर्षियों के हृदयों में चारों वेदों का उपदेश करता है, जिनका अध्ययन करके हम ज्ञानी बनते हैं। उसकी इस महती कृपा का कौन अभिनन्दन नहीं करेगा? ॥८॥
Subject
परमात्मा ने ही सृष्टि के आदि में वेदविज्ञान का प्रवचन किया था, यह कहते हैं।