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Samveda Mantra 261

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
व꣣यं꣡ घ꣢ त्वा सु꣣ता꣡व꣢न्त꣣ आ꣢पो꣣ न꣢ वृ꣣क्त꣡ब꣢र्हिषः । प꣣वि꣡त्र꣢स्य प्र꣣स्र꣡व꣢णेषु वृत्रह꣣न्प꣡रि꣢ स्तो꣣ता꣡र꣢ आसते ॥२६१॥

व꣣य꣢म् । घ꣣ । त्वा । सुता꣡व꣢न्तः । आ꣡पः꣢꣯ । न । वृ꣣क्त꣡ब꣢र्हिषः । वृ꣣क्त꣢ । ब꣣र्हिषः । पवि꣡त्र꣢स्य । प्र꣣स्र꣡व꣢णेषु । प्र꣣ । स्र꣡व꣢꣯णेषु । वृ꣣त्रहन् । वृत्र । हन् । प꣡रि꣢꣯ । स्तो꣣ता꣡रः꣢ । आ꣣सते ॥२६१॥

Mantra without Swara
वयं घ त्वा सुतावन्त आपो न वृक्तबर्हिषः । पवित्रस्य प्रस्रवणेषु वृत्रहन्परि स्तोतार आसते ॥

वयम् । घ । त्वा । सुतावन्तः । आपः । न । वृक्तबर्हिषः । वृक्त । बर्हिषः । पवित्रस्य । प्रस्रवणेषु । प्र । स्रवणेषु । वृत्रहन् । वृत्र । हन् । परि । स्तोतारः । आसते ॥२६१॥

Samveda - Mantra Number : 261
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 3;

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Meaning
हे इन्द्र परमात्मन् ! (वृक्तबर्हिषः) जिन्होंने अन्तरिक्ष को छोड़ दिया है, ऐसे (आपः न) मेघ जलों के समान (वृक्तबर्हिषः) सांसारिक एषणाओं को छोड़े हुए (सुतावन्तः) उपासना-रसों को अभिषुत किये हुए (वयं घ) हम (त्वा) आपकी स्तुति करते हैं, क्योंकि, हे (वृत्रहन्) पापविनाशक परमेश्वर ! (स्तोतारः) आपके स्तोता लोग (पवित्रस्य) शुद्ध सात्त्विक आनन्द के (प्रस्रवणेषु) प्रवाहों में (परि आसते) तैरा करते हैं, जैसे अन्तरिक्ष को छोड़े हुए उपर्युक्त मेघ-जल (प्रस्रवणेषु) नदियों, झरनों आदियों में (परि आसते) बहते हैं ॥९॥ इस मन्त्र में श्लिष्टोपमालङ्कार है। साथ ही कारणरूप उत्तरार्द्धवाक्य कार्यरूप पूर्वार्द्धवाक्य का समर्थन कर रहा है अतः कारण से कार्यसमर्थनरूप अर्थान्तरन्यास अलङ्कार भी है ॥९॥
Essence
जैसे मेघों के जल आकाश को छोड़कर भूमि पर आकर धान्य, वनस्पति आदि को उत्पन्न करते हैं, वैसे ही हम पुत्रैषणा, वित्तैषणा, लोकैषणा आदि का परित्याग करके परमात्मा को प्राप्त कर आनन्द-रस को उत्पन्न करें ॥९॥
Subject
अगले मन्त्र में यह वर्णन है कि क्यों हम परमेश्वर की उपासना करते हैं।

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