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Samveda Mantra 253

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- भर्गः प्रागाथः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
श꣣ग्ध्यू꣢३षु꣡ श꣢चीपत꣣ इ꣢न्द्र꣣ वि꣡श्वा꣢भिरू꣣ति꣡भिः꣢ । भ꣢गं꣣ न꣡ हि त्वा꣢꣯ य꣣श꣡सं꣢ वसु꣣वि꣢द꣣म꣡नु꣢ शूर꣣ च꣡रा꣢मसि ॥२५३॥

श꣣ग्धि꣢ । उ꣣ । सु꣢ । श꣣चीपते । शची । पते । इ꣡न्द्र꣢꣯ । वि꣡श्वा꣢꣯भिः । ऊ꣣ति꣡भिः꣢ । भ꣡ग꣢꣯म् । न । हि । त्वा꣣ । यश꣡स꣢म् । व꣣सुवि꣡द꣢म् । व꣣सु । वि꣡द꣢꣯म् । अ꣡नु꣢꣯ । शू꣣र । च꣡रा꣢꣯मसि ॥२५३॥

Mantra without Swara
शग्ध्यू३षु शचीपत इन्द्र विश्वाभिरूतिभिः । भगं न हि त्वा यशसं वसुविदमनु शूर चरामसि ॥

शग्धि । उ । सु । शचीपते । शची । पते । इन्द्र । विश्वाभिः । ऊतिभिः । भगम् । न । हि । त्वा । यशसम् । वसुविदम् । वसु । विदम् । अनु । शूर । चरामसि ॥२५३॥

Samveda - Mantra Number : 253
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 3;

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1 Bhashyas
Meaning
हे (शचीपते इन्द्र) प्रज्ञा, वाणी एवं कर्म के स्वामी परमात्मन् व राजन् ! आप (विश्वाभिः) सब (ऊतिभिः) रक्षाओं से (उ) निश्चय ही (सु) भली-भाँति (शग्धि) हमें शक्तिशाली कीजिए। (भगं न हि) सूर्य के समान (यशसम्) यशस्वी, (वसुविदम्) ऐश्वर्य प्राप्त करानेवाले (त्वा अनु) आपकी आज्ञाओं के अनुकूल (शूर) हे दानशूर, धर्मशूर, विद्याशूर, वीरताशूर, परमात्मन् व राजन् ! हम लोग (चरामसि) आचरण करते हैं ॥१॥ इस मन्त्र में श्लेष और उपमालङ्कार है ॥१॥
Essence
परमात्मा के समान राजा को भी वाग्मी, कर्मण्य, ज्ञानी, प्रजा की रक्षा करने में समर्थ, सूर्य के समान कीर्तिमान्, प्रजा को ऐश्वर्य प्राप्त करानेवाला, दानवीर, धर्मवीर, विद्यावीर और युद्धवीर होना चाहिए। साथ ही प्रजाओं को परमात्मा तथा धर्मात्मा राजा की आज्ञाओं के अनुकूल चलना चाहिए ॥१॥
Subject
प्रथम मन्त्र में इन्द्र नाम से परमात्मा और राजा को सम्बोधित किया गया है।