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Samveda Mantra 247

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
त्व꣢म꣣ङ्ग꣡ प्र श꣢꣯ꣳसिषो दे꣣वः꣡ श꣢विष्ठ꣣ म꣡र्त्य꣢म् । न꣢꣫ त्वद꣣न्यो꣡ म꣢घवन्नस्ति मर्डि꣣ते꣢न्द्र꣣ ब्र꣡वी꣢मि ते꣣ व꣡चः꣢ ॥२४७॥

त्व꣢म् । अ꣣ङ्ग꣢ । प्र । शँ꣣सिषः । देवः꣢ । श꣣विष्ठ । म꣡र्त्य꣢꣯म् । न । त्वत् । अ꣣न्यः꣢ । अ꣣न् । यः꣢ । म꣣घवन् । अस्ति । मर्डिता꣢ । इ꣡न्द्र꣢꣯ । ब्र꣡वी꣢꣯मि । ते꣣ । व꣡चः꣢꣯ ॥२४७॥

Mantra without Swara
त्वमङ्ग प्र शꣳसिषो देवः शविष्ठ मर्त्यम् । न त्वदन्यो मघवन्नस्ति मर्डितेन्द्र ब्रवीमि ते वचः ॥

त्वम् । अङ्ग । प्र । शँसिषः । देवः । शविष्ठ । मर्त्यम् । न । त्वत् । अन्यः । अन् । यः । मघवन् । अस्ति । मर्डिता । इन्द्र । ब्रवीमि । ते । वचः ॥२४७॥

Samveda - Mantra Number : 247
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 2;

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Meaning
(अङ्ग) हे (शविष्ठ) सबसे अधिक बली परमात्मन् वा राजन् ! (देवः) दिव्यगुणयुक्त (त्वम्) आप (मर्त्यम्) मनुष्य को (प्रशंसिषः) प्रशंसा का पात्र कीजिए। हे (मघवन्) ऐश्वर्यशालिन् ! (त्वत् अन्यः) आपसे भिन्न अन्य कोई भी (मर्डिता) सुखदाता (न अस्ति) नहीं है। हे (इन्द्र) विघ्नविदारक सिद्धिदायक परमेश्वर वा राजन् ! मैं (ते) आपके लिए (वचः) स्तुति-वचन (ब्रवीमि) बोल रहा हूँ ॥५॥ इस मन्त्र में अर्थश्लेषालङ्कार है ॥५॥
Essence
हे बलियों में बलिष्ठ, समस्त दिव्य गुणों के पारावार, सकलसम्पत्तिशाली, न्याय-विद्या-विवेक-दया आदि ऐश्वर्यों के निधि परमात्मन् वा राजन् ! कभी अधर्माचरण में संलग्न होकर हम जगत् में निन्दा के पात्र हो जाते हैं। आप कृपा करके हमें धर्म में नियुक्त करके और शुभ कर्मों में समुत्साहित करके प्रशंसा का पात्र बना दीजिए ॥५॥
Subject
अगले मन्त्र में परमात्मा और राजा से प्रार्थना की गयी है।