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Samveda Mantra 244

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मेधातिथि0मेध्यातिथी काण्वौ Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
य꣢ ऋ꣣ते꣡ चि꣢द꣣भिश्रि꣡षः꣢ पु꣣रा꣢ ज꣣त्रु꣡भ्य꣢ आ꣣तृ꣡दः꣢ । स꣡न्धा꣢ता स꣣न्धिं꣢ म꣣घ꣡वा꣢ पुरू꣣व꣢सु꣣र्नि꣡ष्क꣢र्ता꣣ वि꣡ह्रु꣢तं꣣ पु꣡नः꣢ ॥२४४॥

यः꣢ । ऋ꣣ते꣢ । चि꣣त् । अभिश्रि꣡षः꣢ । अ꣣भि । श्रि꣡षः꣢꣯ । पु꣣रा꣢ । ज꣣त्रु꣡भ्यः꣢ । आ꣣तृ꣡दः꣢ । आ꣣ । तृ꣡दः꣢꣯ । स꣡न्धा꣢꣯ता । स꣣म् । धा꣣ता । सन्धि꣢म् । स꣣म् । धि꣢म् । म꣣घ꣡वा꣢ । पु꣣रूव꣡सुः꣢ । पु꣣रु । व꣡सुः꣢꣯ । नि꣡ष्क꣢꣯र्ता । निः । क꣣र्त्ता । वि꣡ह्रु꣢꣯तम् । वि । ह्रु꣣तम् । पु꣢नरि꣡ति꣢ ॥२४४॥

Mantra without Swara
य ऋते चिदभिश्रिषः पुरा जत्रुभ्य आतृदः । सन्धाता सन्धिं मघवा पुरूवसुर्निष्कर्ता विह्रुतं पुनः ॥

यः । ऋते । चित् । अभिश्रिषः । अभि । श्रिषः । पुरा । जत्रुभ्यः । आतृदः । आ । तृदः । सन्धाता । सम् । धाता । सन्धिम् । सम् । धिम् । मघवा । पुरूवसुः । पुरु । वसुः । निष्कर्ता । निः । कर्त्ता । विह्रुतम् । वि । ह्रुतम् । पुनरिति ॥२४४॥

Samveda - Mantra Number : 244
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 2;

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1 Bhashyas
Meaning
(यः) जो (अभिश्रिषः) जोड़नेवाले पदार्थ गोंद, सरेस, प्लास्टर आदि के (ऋते चित्) बिना ही (जत्रुभ्यः) गर्दन की हड्डियों पर से (आतृदः) गले के कटने से (पुरा) पहले ही (सन्धिम्) जोड़ने योग्य अवयव को (सन्धाता) जोड़ देता है, अर्थात् शस्त्र आदि से गले के एक भाग के कट जाने पर भी कटे हुए भाग को प्राकृतिक रूप से भरकर पुनः स्वस्थ कर देता है, जिससे सिर कटकर गिरता नहीं, वह (पुरूवसुः) बहुत से शरीरावयवों को यथास्थान बसानेवाला (मघवा) चिकित्सा-विज्ञानरूप धन का धनी परमेश्वर, जीवात्मा, प्राण वा शल्य-चिकित्सक (विह्रुतम्) टेढ़े हुए भी अङ्ग को (पुनः) फिर से (निष्कर्ता) ठीक कर देता है ॥२॥ इस मन्त्र में जोड़नेवाले द्रव्य रूप कारण के बिना ही जोड़ने रूप कार्य की उत्पत्ति का वर्णन होने से विभावना अलङ्कार है ॥२॥
Essence
अहो, परमेश्वर की कैसी शरीर-रचना की चतुरता है ! यदि वह जोड़नेवाले द्रव्य गोंद आदि के बिना ही बीच में जोड़ लगाकर सिर को धड़ के साथ दृढ़तापूर्वक जोड़ न देता तो कभी भी कहीं भी सिर धड़ से अलग होकर गिर जाता। यह भी परमेश्वर का ही कर्तृत्व है कि शरीर का कोई भी अङ्ग यदि घायल या टेढ़ा हो जाता है तो जीवात्मा और प्राण की सहायता से तथा शरीर की स्वाभाविक क्रिया से फिर घाव भर जाता है और टेढ़ा अङ्ग सीधा हो जाता है। कुशल शल्य-चिकित्सक भी इस कर्म में परमेश्वर का अनुकरण करता है। युद्ध में यदि शत्रु के शस्त्र-प्रहार से किसी योद्धा का गले का एक भाग कट जाता है तो वह कटेभाग को सुई से सीकर और ओषधि का लेप करके पुनः स्वस्थ कर देता है। दुर्घटना आदि से यदि किसी का अङ्ग विकृत या टेढ़ा हो जाता है तो उसे भी वह उचित उपायों से ठीक कर देता है ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में परमात्मा, जीवात्मा, प्राण और शल्यचिकित्सक का कर्तृत्व वर्णित है।