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Samveda Mantra 240

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- भर्गः प्रागाथः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
त्व꣢꣫ꣳ ह्येहि꣣ चे꣡र꣢वे वि꣣दा꣢꣫ भगं꣣ व꣡सु꣢त्तये । उ꣡द्वा꣢वृषस्व मघव꣣न्ग꣡वि꣢ष्टय꣣ उ꣢दि꣣न्द्रा꣡श्व꣢मिष्टये ॥२४०॥

त्व꣢म् । हि । आ । इ꣣हि । चे꣡र꣢꣯वे । वि꣣दाः꣢ । भ꣡ग꣢꣯म् । व꣡सु꣢꣯त्तये । उत् । वा꣣वृषस्व । मघवन् । ग꣡वि꣢꣯ष्टये । गो । इ꣣ष्टये । उ꣢त् । इ꣣न्द्र । अ꣡श्व꣢꣯मिष्टये । अ꣡श्व꣢꣯म् । इ꣣ष्टये ॥२४०॥

Mantra without Swara
त्वꣳ ह्येहि चेरवे विदा भगं वसुत्तये । उद्वावृषस्व मघवन्गविष्टय उदिन्द्राश्वमिष्टये ॥

त्वम् । हि । आ । इहि । चेरवे । विदाः । भगम् । वसुत्तये । उत् । वावृषस्व । मघवन् । गविष्टये । गो । इष्टये । उत् । इन्द्र । अश्वमिष्टये । अश्वम् । इष्टये ॥२४०॥

Samveda - Mantra Number : 240
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 1;

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) परमेश्वर वा राजन् ! (त्वं हि) आप (चेरवे) मुझ पुरुषार्थी के हित के लिए (आ इहि) आइए। (वसुत्तये) मुझ धन के दानी के लिए (भगम्) धन (विदाः) प्राप्त कराइए। हे (मघवन्) ऐश्वर्यशालिन् ! आप(गविष्टये) मुझ प्रशस्त इन्द्रिय, पृथिवीराज्य, विद्याप्रकाश आदि के अभिलाषी के लिए (उद्वावृषस्व) धन, विद्या आदि की अतिशय पुनःपुनः वर्षा कीजिए। आप (अश्वमिष्टये) घोड़े, बल, वेग, प्राण आदि के इच्छुक मेरे लिए (उद्वावृषस्व) अतिशयरूप सेपुनःपुनः इन वस्तुओं को बरसाइए ॥८॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। आ, जान, बरसा इन सब क्रियाओं का एक कर्ताकारक से सम्बन्ध होने के कारण दीपक अलङ्कार भी है। ‘ष्टय, ष्टये में छेकानुप्रास और द्वितीय तथा चतुर्थ पाद के अन्त में अये होने से अन्त्यानुप्रास भी है ॥८॥
Essence
परमेश्वर और राजा आदि राज्याधिकारीगण उसी की सहायता करते हैं, जो ‘चरैवेति चरैवेति’ ‘पुरुषार्थ करो, पुरुषार्थ करो।‘ (ए० ब्रा० ७।३।३) के उपदेश को अपने जीवन में चरितार्थ करता है और पुरुषार्थ से धन कमाकर सत्पात्रों में उसका दान भी करता है ॥८॥
Subject
अगले मन्त्र में परमेश्वर और राजा से प्रार्थना की गयी है।