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Samveda Mantra 228

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- दुर्मित्रः कौत्सः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
क꣣दा꣡ व꣢सो स्तो꣣त्रं꣡ हर्य꣢꣯त आ꣡ अव꣢꣯ श्म꣣शा꣡ रु꣢ध꣣द्वाः꣢ । दी꣣र्घ꣢ꣳ सु꣣तं꣢ वा꣣ता꣡प्या꣢य ॥२२८॥

क꣣दा꣢ । व꣣सो । स्तोत्र꣢म् । ह꣡र्य꣢꣯ते । आ । अ꣡व꣢꣯ । श्म꣣शा꣢ । रु꣣धत् । वा꣡रिति꣢दी꣣र्घ꣢म् । सु꣣त꣢म् । वा꣣ता꣡प्या꣢य । वा꣣त । आ꣡प्या꣢꣯य ॥२२८॥

Mantra without Swara
कदा वसो स्तोत्रं हर्यत आ अव श्मशा रुधद्वाः । दीर्घꣳ सुतं वाताप्याय ॥

कदा । वसो । स्तोत्रम् । हर्यते । आ । अव । श्मशा । रुधत् । वारितिदीर्घम् । सुतम् । वाताप्याय । वात । आप्याय ॥२२८॥

Samveda - Mantra Number : 228
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 12;

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Meaning
प्रथम—भौतिक वर्षा के पक्ष में। बहुत समय तक वर्षा न होने पर जल के अभाव से पीड़ित मनुष्य कहता है—हे (वसो) निवासप्रद इन्द्र जगदीश्वर ! वर्षा के लिए (स्तोत्रम्) स्तोत्र को (हर्यते) आपके प्रति पहुँचाते हुए मेरे लिए (कदा) कब (श्मशा) वर्षाजल से परिपूर्ण नदी या नहर (वाः) जल को (आ अवरुधत्) लाकर खेत, जलाशय आदि में रोकेगी? मैनें (वाताप्याय) वर्षा-जल के लिए (दीर्घम्) लम्बे समय तक (सुतम्) वृष्टियज्ञ किया है ॥ द्वितीय—अध्यात्म-वर्षा के पक्ष में। दिव्य आनन्दरस से परिपूर्ण परमेश्वर के पास से आनन्दरस की वर्षा की कामना करता हुआ साधक कह रहा है—हे (वसो) मुझ निर्धन के धन, निवासदाता जगदीश्वर ! आनन्दरस की वर्षा के लिए (स्तोत्रम्) स्तुति को (हर्यते) आपके प्रति पहुँचाते हुए मेरे लिए (कदा) कब (श्मशा) आपके पास से बहती हुई आनन्दरस की धारा (वाः) आनन्दरस को (आ अवरुधत्) लाकर मेरे हृदयरूप क्षेत्र या जलाशय में रोकेगी? हे रसागार ! चिरकालीन दुःख के दावानल से दग्ध मैंने (वाताप्याय) दिव्य आनन्द-जल की वर्षा के लिए (दीर्घम्) लम्बे समय तक (सुतम्) श्रद्धारस प्रस्रुत करते हुए अध्यात्म-यज्ञ निष्पन्न किया है। तो भी आनन्द-रस की वर्षा मुझे क्यों नहीं प्राप्त हो रही है? ॥६॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥६॥
Essence
जैसे अनावृष्टि होनेपर वर्षा के लिए लम्बा वृष्टि-यज्ञ किया जाता है, वैसे ही आनन्द-रस का प्यासा मैं आनन्द-रस की वर्षा को पाने के लिए दीर्घ ध्यान-यज्ञ चिरकाल से कर रहा हूँ। तो भी हे प्रभो, क्यों आप आनन्द-वारि नहीं बरसा रहे हैं? बरसाओ, बरसाओ, हे देव, दिव्य आनन्द को बरसाओ। नहीं तो अनेक प्रकार से सांसारिक संतापों से संतप्त हुआ मैं जीवन धारण भी नहीं कर सकूँगा ॥६॥
Subject
अगले मन्त्र में भौतिक तथा दिव्य वर्षा की कामना करता हुआ कोई कह रहा है।

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