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Samveda Mantra 211

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- गोषूक्त्यश्वसूक्तिनौ काण्वायनौ Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
अ꣣पां꣡ फेने꣢꣯न꣣ न꣡मु꣢चेः꣣ शि꣡र꣢ इ꣣न्द्रो꣡द꣢वर्तयः । वि꣢श्वा꣣ य꣡दज꣢꣯य꣣ स्पृ꣡धः꣢ ॥२११॥

अ꣣पा꣢म् । फे꣡ने꣢꣯न । न꣡मु꣢꣯चेः । न । मु꣣चेः । शि꣡रः꣢꣯ । इ꣣न्द्र । उ꣢त् । अ꣣वर्तयः । वि꣡श्वाः꣢꣯ । यत् । अ꣡ज꣢꣯यः । स्पृ꣡धः꣢꣯ ॥२११॥

Mantra without Swara
अपां फेनेन नमुचेः शिर इन्द्रोदवर्तयः । विश्वा यदजय स्पृधः ॥

अपाम् । फेनेन । नमुचेः । न । मुचेः । शिरः । इन्द्र । उत् । अवर्तयः । विश्वाः । यत् । अजयः । स्पृधः ॥२११॥

Samveda - Mantra Number : 211
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 10;

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Meaning
प्रथम—अध्यात्म-पक्ष में। हे (इन्द्र) परमात्मन् व जीवात्मन् ! तुम (अपां फेनेन) पानी के झाग के समान स्वच्छ सात्त्विक चित्त की तरङ्ग से (नमुचेः) न छोड़नेवाले, प्रत्युत दृढ़ता से अपना पैर जमा लेनेवाले पाप के(शिरः) सिर को अर्थात् ऊँचे उठे प्रभाव को (उदवर्तयः) पृथक् कर देते हो, (यत्) जब (विश्वाः) सब (स्पृधः) पापरूप नमुचि के सहायक काम-क्रोध आदि शत्रुओं की स्पर्धाशील सेनाओं को (अजयः) जीतते हो ॥ द्वितीय—आयुर्वेद के पक्ष में।हे (इन्द्र) रोगविदारक वैद्य ! आप (अपां फेनेन) समुद्रफेन रूप औषध से (नमुचेः) शरीर को न छोड़नेवाले, दृढ़ता से जमे रोग के (शिरः) हानिकारक प्रभाव को (उदवर्तयः) उच्छिन्न कर देते हो, (यत्) जब (विश्वाः) समस्त (स्पृधः) स्पर्धालु, रोग-सहचर वेदना, वमन, मूर्छा आदि उत्पातों को (अजयः) जीतते हो ॥ तृतीय—राजा के पक्ष में।हे (इन्द्र) वीर राजन् ! आप (अपाम्) राष्ट्र में व्याप्त प्रजाओं के (फेनेन) कर-रूप से प्राप्त तथा चक्रवृद्धि ब्याज आदि से बढ़े हुए धन से (नमुचेः) राष्ट्र को न छोड़नेवाले, प्रत्युत राष्ट्र में व्याप्त होकर स्थित दुःख, दरिद्रता आदि के (शिरः) सिर को, उग्रता को (उदवर्तयः) उच्छिन्न कर देते हो, (यत्) जब (विश्वाः) समस्त (स्पृधः) हिंसा, रक्तपात, लूट-पाट, ठगी, तस्कर-व्यापार आदि स्पर्धालु वैरियों को (अजयः) पराजित कर देते हो ॥ चतुर्थ—सेनापति के पक्ष में। हे (इन्द्र) सूर्यवत् विद्यमान शत्रुविदारक सेनापति ! आप (अपां फेनेन) जलों के झाग के समान उज्ज्वल शस्त्रास्त्र-समूह के द्वारा (नमुचेः) न छोड़नेवाले शत्रु के (शिरः) सिर को (उदवर्तयः) धड़ से अलग कर देते हो, (यत्) जब (विश्वाः) सब (स्पृधः) स्पर्धा करनेवाली शत्रुसेनाओं को (अजयः) जीतते हो ॥८॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है, उपमानोपमेयभाव ध्वनित हो रहा है ॥८॥
Essence
जैसे कोई वैद्यराज समुद्रफेन औषध से रोग को नष्ट करता है, जैसे राजा प्रजा से कर-रूप में प्राप्त हुए धन से प्रजा के दुःखों को दूर करता है और जैसे सेनापति शस्त्रास्त्र-समूह से शत्रु का सिर काटता है, वैसे ही परमेश्वर और जीवात्मा मनुष्य के मन की सात्त्विक वृत्तियों से पाप को उन्मूलित करते हैं ॥८॥ यहाँ सायणाचार्य ने यह इतिहास प्रदर्शित किया है—पहले कभी इन्द्र असुरों को जीतकर भी नमुचि नामक असुर को पकड़ने में असमर्थ रहा। उल्टे नमुचि ने ही युद्ध करते हुए इन्द्र को पकड़ लिया। पकड़े हुए इन्द्र को नमुचि ने कहा कि तुझे मैं इस शर्त पर छोड़ सकता हूँ कि तू मुझे कभी न दिन में मारे, न रात में, न सूखे हथियार से मारे, न गीले हथियार से। जब इन्द्र ने यह शर्त मान ली तब नमुचि ने उसे छोड़ दिया। उससे छूटे हुए इन्द्र ने दिन-रात की सन्धि में झाग से उसका सिर काटा (क्योंकि दिन-रात की सन्धि न दिन कहलाती है, न रात, और झाग भी न सूखा होता है, न गीला)।’’ यह इतिहास दिखाकर सायण कहते हैं कि यही विषय इस ऋचा में प्रतिपादित है। विवरणकार माधव ने भी ऐसा ही इतिहास वर्णित किया है। असल में तो यह कल्पित कथानक है, सचमुच घटित कोई इतिहास नहीं है ॥८॥
Subject
अगले मन्त्र में यह वर्णन है कि परमात्मा, जीवात्मा, वैद्य, राजा और सेनापति किस प्रकार नमुचि का संहार करते हैं।

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