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Samveda Mantra 197

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- श्रुतकक्ष आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
आ꣡ त्वा꣢ विश꣣न्त्वि꣡न्द꣢वः समु꣣द्र꣡मि꣢व꣣ सि꣡न्ध꣢वः । न꣢꣫ त्वामि꣣न्द्रा꣡ति꣢ रिच्यते ॥१९७॥

आ꣢ । त्वा꣣ । विशन्तु । इ꣡न्द꣢꣯वः । स꣣मुद्र꣢म् । स꣣म् । उद्र꣢म् । इ꣣व । सि꣡न्ध꣢꣯वः । न । त्वाम् । इ꣣न्द्र । अ꣡ति꣢꣯ । रि꣣च्यते ॥१९७॥

Mantra without Swara
आ त्वा विशन्त्विन्दवः समुद्रमिव सिन्धवः । न त्वामिन्द्राति रिच्यते ॥

आ । त्वा । विशन्तु । इन्दवः । समुद्रम् । सम् । उद्रम् । इव । सिन्धवः । न । त्वाम् । इन्द्र । अति । रिच्यते ॥१९७॥

Samveda - Mantra Number : 197
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 9;

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1 Bhashyas
Meaning
(इन्दवः) चन्द्र-किरणों के सदृश आह्लादक मेरे स्तुतिरूप सोम (त्वा) तुझ परमेश्वर को (आ विशन्तु) प्राप्त करें, (सिन्धवः) नदियाँ (समुद्रम् इव) जैसे समुद्र को प्राप्त करती हैं। हे (इन्द्र) परमैश्वर्यशालिन् दुःखविदारक, सुखदाता परमात्मन् ! (त्वाम्) तुझसे, कोई भी (न अतिरिच्यते) महिमा में अधिक नहीं है ॥४॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार है ॥४॥
Essence
जैसे नदियाँ रत्नाकर समुद्र को प्राप्त करके रत्नों से मण्डित हो जाती हैं, वैसे ही सब प्रजाएँ स्तुति द्वारा गुण-रूप रत्नों के खजाने परमेश्वर को प्राप्त करके गुणों की निधि हो जाएँ ॥४॥
Subject
अगले मन्त्र में परमात्मा की स्तुति का विषय है।