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Samveda Mantra 192

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- सत्यधृतिर्वारुणिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
म꣡हि꣢ त्री꣣णा꣡मव꣢꣯रस्तु द्यु꣣क्षं꣢ मि꣣त्र꣡स्या꣢र्य꣣म्णः꣢ । दु꣣राध꣢र्षं꣣ व꣡रु꣢णस्य ॥१९२॥

म꣡हि꣢꣯ । त्री꣣णा꣢म् । अवरि꣡ति꣢ । अ꣣स्तु । द्युक्ष꣢म् । द्यु꣣ । क्ष꣢म् । मि꣣त्र꣡स्य꣢ । मि꣣ । त्र꣡स्य꣢꣯ । अ꣣र्यम्णः꣢ । दु꣣रा꣡धर्ष꣢म् । दुः꣣ । आध꣡र्ष꣢म् । व꣡रु꣢꣯णस्य ॥१९२॥

Mantra without Swara
महि त्रीणामवरस्तु द्युक्षं मित्रस्यार्यम्णः । दुराधर्षं वरुणस्य ॥

महि । त्रीणाम् । अवरिति । अस्तु । द्युक्षम् । द्यु । क्षम् । मित्रस्य । मि । त्रस्य । अर्यम्णः । दुराधर्षम् । दुः । आधर्षम् । वरुणस्य ॥१९२॥

Samveda - Mantra Number : 192
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 8;

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1 Bhashyas
Meaning
प्रथम—अध्यात्म और अधिदैवत पक्ष में। ऋचा का देवता इन्द्र होने से इन्द्र को सम्बोधन अपेक्षित है। हे इन्द्र परमैश्वर्यशाली जगदीश्वर ! आपकी कृपा से (मित्रस्य) अकाल-मृत्यु से रक्षा करनेवाले वायु और जीवात्मा का, (अर्यम्णः) अपने आकर्षण से पृथिवी आदि लोकों का नियन्त्रण करनेवाले सूर्यलोक का तथा इन्द्रियों को नियन्त्रण में रखनेवाले मन का, और (वरुणस्य) आच्छादक मेघ का तथा प्राण का, (त्रीणाम्) इन तीनों का (महत्) महान्, (द्युक्षम्) तेज को निवास करानेवाला और (दुराधर्षम्) दुष्पराजेय, दृढ़ (अवः) रक्षण (अस्तु) हमें प्राप्त हो ॥ द्वितीय—राष्ट्र के पक्ष में। हे (इन्द्र) प्रजा के कष्टों को दूर करने तथा सुख प्रदान करनेवाले राजन् ! आपकी व्यवस्था से (मित्रस्य) सबके मित्र शिक्षाध्यक्ष का, (अर्यम्णः) श्रेष्ठों और दुष्टों के साथ यथायोग्य व्यवहार करनेवाले न्यायाध्यक्ष का, और (वरुणस्य) पाशधारी, शस्त्रास्त्रयुक्त, धनुर्वेद में कुशल सेनाध्यक्ष का, (त्रीणाम्) इन तीनों का (महि) महान्, (द्युक्षम्) राजनीति के प्रकाश से पूर्ण, (दुराधर्षम्) दुष्पराजेय (अवः) रक्षण (अस्तु) हम प्रजाजनों को प्राप्त हो ॥८॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥८॥
Essence
परमात्मा के अनुशासन में शरीरस्थ आत्मा, मन, बुद्धि, प्राण आदि और बाह्य सूर्य, पवन, बादल आदि तथा राजा के अनुशासन में सब राजमन्त्री एवं अन्य राज्याधिकारी अपना-अपना रक्षण आदि हमें प्रदान करें, जिससे हम उत्कर्ष के लिए प्रयत्न करते हुए समस्त प्रेय और श्रेय को प्राप्त कर सकें ॥८॥
Subject
अगले मन्त्र में मित्र, वरुण और अर्यमा से रक्षण की याचना की गयी है।