Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Samveda Mantra 1872

1875 Mantra
Devata- संग्रामशिषः Rishi- पायुर्भारद्वाजः Chhand- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
यो꣢ नः꣣ स्वो꣡ऽर꣢णो꣣ य꣢श्च꣣ नि꣢ष्ट्यो꣣ जि꣡घा꣢ꣳसति । दे꣣वा꣡स्तꣳ सर्वे꣢꣯ धूर्वन्तु꣣ ब्र꣢ह्म꣣ व꣢र्म꣣ ममान्त꣢꣯र꣣ꣳ श꣢र्म꣣ व꣢र्म꣣ म꣡मा꣢न्त꣢꣯रम् ॥१८७२॥

यः꣢ । नः꣣ । स्वः꣢ । अ꣡रणः꣢꣯ । यः । च꣣ । नि꣡ष्ट्यः꣢꣯ । जि꣡घा꣢꣯ꣳसति । दे꣣वाः꣢ । तम् । स꣡र्वे꣢꣯ । धू꣣र्वन्तु । ब्र꣡ह्म꣢꣯ । व꣡र्म꣢꣯ । म꣡म꣢꣯ । अ꣡न्त꣢꣯रम् । श꣡र्म꣢꣯ । व꣡र्म꣢꣯ । म꣡म꣢꣯ । अ꣡न्त꣢꣯रम् ॥१८७२॥

Mantra without Swara
यो नः स्वोऽरणो यश्च निष्ट्यो जिघाꣳसति । देवास्तꣳ सर्वे धूर्वन्तु ब्रह्म वर्म ममान्तरꣳ शर्म वर्म ममान्तरम् ॥

यः । नः । स्वः । अरणः । यः । च । निष्ट्यः । जिघाꣳसति । देवाः । तम् । सर्वे । धूर्वन्तु । ब्रह्म । वर्म । मम । अन्तरम् । शर्म । वर्म । मम । अन्तरम् ॥१८७२॥

Samveda - Mantra Number : 1872
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 9; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 21; Khand » 1;

Bhashya

More bhashyas
Meaning
(यः) जो (नः) हमें (स्वः) अपना दुर्भाव, (अरणः) पराया दुर्भाव, (यः च) और जो (निष्ठ्यः) शत्रु का दुर्भाव (जिघांसति) नष्ट करना चाहता है, (तम्) उस काम-क्रोध आदि दुर्भाव का (सर्वे) सब (देवाः) दिव्यगुण वा सदाचारी विद्वान् जन (धूर्वन्तु) वध कर दें। (ब्रह्म) महान् जगदीश्वर (मम) मेरा (अन्तरम्) आन्तरिक (वर्म) कवच अर्थात् रक्षा-साधन हो जाए, (शर्म) जगदीश की शरण (मम) मेरा (अन्तरम्) आन्तरिक (वर्म) कवच अर्थात् रक्षा-साधन हो जाए ॥३॥
Essence
कभी मनुष्य निज मन से उत्पन्न पाप में प्रवृत्त होता है और कभी परिचित जन से प्रेरित वा शत्रु से प्रेरित पाप में लिप्त होता है। दिव्य विचारों से, विद्वानों के सङ्ग से और परमेश्वर के ध्यान-चिन्तन से उन पापों को नष्ट करके वह निष्पाप और सच्चरित्र हो सकता है ॥३॥
Subject
अगले मन्त्र में वधेच्छु के विनाश का उपाय दर्शाते हैं।

We are thankful to https://vedicscriptures.in for providing us a substantial amount of data for this section of the Vedas.