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Samveda Mantra 1868

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- शासो भारद्वाजः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
वि꣡ न꣢ इन्द्र꣣ मृ꣡धो꣢ जहि नी꣣चा꣡ य꣢च्छ पृतन्य꣣तः꣢ । यो꣢ अ꣣स्मा꣡ꣳ अ꣢भि꣣दा꣢स꣣त्य꣡ध꣢रं गमया꣣ त꣡मः꣢ ॥१८६८॥

वि । नः꣣ । इन्द्र । मृ꣡धः꣢꣯ । ज꣣हि । नीचा꣢ । य꣣च्छ । पृतन्यतः꣢ । यः । अ꣣स्मा꣢न् । अ꣣भिदा꣡स꣢ति । अ꣣भि । दा꣡स꣢꣯ति । अ꣡ध꣢꣯रम् । ग꣣मय । त꣡मः꣢꣯ ॥१८६८॥

Mantra without Swara
वि न इन्द्र मृधो जहि नीचा यच्छ पृतन्यतः । यो अस्माꣳ अभिदासत्यधरं गमया तमः ॥

वि । नः । इन्द्र । मृधः । जहि । नीचा । यच्छ । पृतन्यतः । यः । अस्मान् । अभिदासति । अभि । दासति । अधरम् । गमय । तमः ॥१८६८॥

Samveda - Mantra Number : 1868
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 9; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 21; Khand » 1;

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) जीवात्मन् वा सेनापति ! तुम (नः) हमारे (मृधः) हिंसकों को (विजहि) विनष्ट करो, (पृतन्यतः) सेना से आक्रमण करनेवाले काम-क्रोध आदि को वा बाहरी शत्रुओं को (नीचा यच्छ) नीचा दिखाओ। (यः) जो आन्तरिक वा बाहरी शत्रु (अस्मान्) हम धार्मिकों को (अभिदासति) सर्वथा क्षीण करना चाहता है, उसे (अधरं तमः गमय) घोर दुर्गति प्राप्त कराओ वा निचले कारागार में डाल दो ॥२॥
Essence
जैसे सेनापति दुष्ट शत्रुओं का वध कर देता है अथवा उन्हें कारागार में डाल देता है, वैसे ही शरीर का अधिष्ठाता जीवात्मा सब आन्तरिक शत्रुओं की घोर दुर्गति करके वा उन्हें विनष्ट करके अपने निष्कण्टक साम्राज्य को स्थापित करे ॥२॥
Subject
आगे पुनः वही विषय कहा गया है।