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Samveda Mantra 1866

1875 Mantra
Devata- संग्रामशिषः Rishi- पायुर्भारद्वाजः Chhand- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
य꣡त्र꣢ बा꣣णाः꣢ स꣣म्प꣡त꣢न्ति कुमा꣣रा꣡ वि꣢शि꣣खा꣡ इ꣢व । त꣡त्र꣢ नो꣣ ब्र꣡ह्म꣢ण꣣स्प꣢ति꣣र꣡दि꣢तिः꣣ श꣡र्म꣢ यच्छतु वि꣣श्वा꣢हा꣣ श꣡र्म꣢ यच्छतु ॥१८६६॥

य꣡त्र꣢꣯ । बा꣣णाः꣢ । सं꣣प꣡त꣢न्ति । स꣣म् । प꣡त꣢꣯न्ति । कु꣣माराः꣢ । वि꣣शिखाः꣢ । वि꣣ । शिखाः꣢ । इ꣣व । त꣡त्र꣢꣯ । नः꣣ । ब्र꣡ह्म꣢꣯णः । प꣡तिः꣢꣯ । अ꣡दि꣢꣯तिः । अ । दि꣣तिः । श꣡र्म꣢꣯ । य꣢च्छतु । विश्वा꣡हा꣢ । श꣡र्म꣢꣯ । य꣣च्छतु ॥१८६६॥

Mantra without Swara
यत्र बाणाः सम्पतन्ति कुमारा विशिखा इव । तत्र नो ब्रह्मणस्पतिरदितिः शर्म यच्छतु विश्वाहा शर्म यच्छतु ॥

यत्र । बाणाः । संपतन्ति । सम् । पतन्ति । कुमाराः । विशिखाः । वि । शिखाः । इव । तत्र । नः । ब्रह्मणः । पतिः । अदितिः । अ । दितिः । शर्म । यच्छतु । विश्वाहा । शर्म । यच्छतु ॥१८६६॥

Samveda - Mantra Number : 1866
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 9; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 21; Khand » 1;

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1 Bhashyas
Meaning
(यत्र) जिस समराङ्गण में (बाणाः) बाण आदि अस्त्र (सम्पतन्ति) गिरते हैं, (विशिखाः कुमाराः इव) जैसे चूड़ाकर्म संस्कार कराये हुए शिखा-रहित बालक चलने का अभ्यास करते हुए पग-पग पर गिरते हैं, (तत्र) उस समराङ्गण में (ब्रह्मणः पतिः) ज्ञान का रक्षक जीवात्मा और महान् राष्ट्र का रक्षक सेनापति तथा (अदितिः) कुतर्कों से खण्डित न होनेवाली बुद्धि और राष्ट्रभूमि (नः) हमें (शर्म) कल्याण (यच्छतु) प्रदान करे, (विश्वाहा) सदा (शर्म) कल्याण (यच्छतु) प्रदान करे। [निरुक्त्त (१०।४०) में कहा गया है कि किसी वाक्य को दोहराने में बहुत सा चमत्कारिक अर्थ प्रकट होता है। जैसे-‘अहो, दर्शनीय है, अहो दर्शनीय है’, इस वाक्य में। उसी के अनुसार यहाँ ‘शर्म यच्छतु’ वाक्य को दुहराने में बहुत-सा अर्थ समाविष्ट है।] ॥३॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार है ॥३॥
Essence
बाह्य सङ्ग्राम में सेनापति प्रतिपक्षी योद्धाओं को तेज बाणों से काट कर अपने पक्षवालों जैसे को सुख देवे, वैसे ही आध्यात्मिक देवासुरसङ्ग्राम में जीवात्मा काम-क्रोध आदि रिपुओं का छेदन-भेदन करके मनोभूमि को शत्रु-रहित करे ॥३॥
Subject
अगले मन्त्र में युद्ध में विजय की प्रार्थना है।