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Samveda Mantra 1863

1875 Mantra
Devata- इषवः Rishi- पायुर्भारद्वाजः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
अ꣡व꣢सृष्टा꣣ प꣡रा꣢ पत꣣ श꣡र꣢व्ये꣣ ब्र꣡ह्म꣢सꣳशिते । ग꣢च्छा꣣मि꣢त्रा꣣न्प्र꣡ प꣢द्यस्व꣣ मा꣢꣫मीषां꣣ कं꣢ च꣣ नो꣡च्छि꣢षः ॥१८६३॥

अ꣡व꣢꣯ । सृ꣣ष्टा । प꣡रा꣢꣯ । प꣣त । श꣡र꣢꣯व्ये । ब्र꣡ह्म꣢꣯शꣳसिते । ब्र꣡ह्म꣢꣯ । श꣣ꣳसिते । ग꣡च्छ꣢꣯ । अ꣣मि꣡त्रा꣢न् । अ꣣ । मि꣡त्रा꣢꣯न् । प्र । प꣣द्यस्व । मा꣢ । अ꣣मी꣡षा꣢म् । कम् । च꣣ । न꣢ । उत् । शि꣣षः ॥१८६३॥

Mantra without Swara
अवसृष्टा परा पत शरव्ये ब्रह्मसꣳशिते । गच्छामित्रान्प्र पद्यस्व मामीषां कं च नोच्छिषः ॥

अव । सृष्टा । परा । पत । शरव्ये । ब्रह्मशꣳसिते । ब्रह्म । शꣳसिते । गच्छ । अमित्रान् । अ । मित्रान् । प्र । पद्यस्व । मा । अमीषाम् । कम् । च । न । उत् । शिषः ॥१८६३॥

Samveda - Mantra Number : 1863
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 9; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 21; Khand » 1;

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1 Bhashyas
Meaning
हे (ब्रह्मसंशिते) धनुर्वेद के ज्ञाता सेनापति द्वारा तीक्ष्ण अर्थात् उत्साहित की हुई (शरव्ये) शस्त्रास्त्र चलाने में कुशल सेना ! (अवसृष्टा) प्रेरित की हुई तू (परापत) शत्रुओं पर टूट पड़। (गच्छ) जा, (अमित्रान्) शत्रुओं को (प्रपद्यस्व) प्राप्त कर। (अमीषाम्) इनके मध्य (कंचन) किसी को भी (न उच्छिषः) बचा न रहने दे ॥३॥
Essence
जैसे सेनापति से प्रेरित वीरों की सेना शत्रुओं को जीत लेती है, वैसे ही शरीर के अध्यक्ष जीवात्मा से प्रेरित सात्त्विक वीर भावों की सेना तामस दुर्भावों पर विजय पा लेती है। तामस भावों को निःशेष कर देना ही श्रेयस्कर है, क्योंकि नाममात्र भी वे यदि बचे रहें, तो फिर बढ़ जाते हैं ॥३॥
Subject
अब अपनी सेना को उद्बोधन देते हैं।