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Samveda Mantra 1855

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- अप्रतिरथ ऐन्द्रः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ꣣भि꣢ गो꣣त्रा꣢णि꣣ स꣡ह꣢सा꣣ गा꣡ह꣢मानोऽद꣣यो꣢ वी꣣रः꣢ श꣣त꣡म꣢न्यु꣣रि꣡न्द्रः꣢ । दु꣣श्च्यवनः꣡ पृ꣢तना꣣षा꣡ड꣢यु꣣ध्यो꣢३ऽस्मा꣢क꣣ꣳ से꣡ना꣢ अवतु꣣ प्र꣢ यु꣣त्सु꣢ ॥१८५५॥

अ꣣भि꣢ । गो꣣त्रा꣡णि꣢ । स꣡ह꣢꣯सा । गा꣡ह꣢꣯मानः । अ꣣दयः꣢ । अ꣣ । दयः꣢ । वी꣣रः꣢ । श꣣त꣡म꣢न्युः । श꣣त꣢ । म꣣न्युः । इ꣡न्द्रः꣢꣯ । दु꣣श्च्यवनः꣢ । दुः꣣ । च्यवनः꣢ । पृ꣣तनाषा꣢ट् । पृ꣣तना । षा꣢ट् । अ꣣युध्यः꣢ । अ꣣ । युध्यः꣢ । अ꣣स्मा꣡क꣢म् । से꣡नाः꣢꣯ । अ꣣वतु । प्र꣢ । यु꣡त्सु꣢ ॥१८५५॥

Mantra without Swara
अभि गोत्राणि सहसा गाहमानोऽदयो वीरः शतमन्युरिन्द्रः । दुश्च्यवनः पृतनाषाडयुध्यो३ऽस्माकꣳ सेना अवतु प्र युत्सु ॥

अभि । गोत्राणि । सहसा । गाहमानः । अदयः । अ । दयः । वीरः । शतमन्युः । शत । मन्युः । इन्द्रः । दुश्च्यवनः । दुः । च्यवनः । पृतनाषाट् । पृतना । षाट् । अयुध्यः । अ । युध्यः । अस्माकम् । सेनाः । अवतु । प्र । युत्सु ॥१८५५॥

Samveda - Mantra Number : 1855
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 9; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 21; Khand » 1;

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
(सहसा) आत्मबल से (गोत्राणि) व्याधि, स्त्यान, संशय आदि योग-विघ्नों के तथा बाह्य विघ्नों के किलों का (अभि गाहमानः) अवगाहन करता हुआ, (अदयः) आन्तरिक तथा बाह्य शत्रुओं पर दया न दिखानेवाला, (वीरः) वीर, (शतमन्युः) अनन्त तेजवाला, (दुश्च्यवनः) शत्रुओं से विचलित न किया जा सकनेवाला, (पृतनाषाट्) शत्रुसेनाओं को पराजित कर देनेवाला, (अयुध्यः) शत्रुओं के लिए जिससे युद्ध कर पाना असम्भव होता है ऐसा (इन्द्रः) जीवात्मा-रूप सेनापति (युत्सु) आन्तरिक तथा बाह्य देवासुरसङ्ग्रामों में (अस्माकं सेनाः) हमारी यम-नियम आदि की सेनाओं को और धार्मिक योद्धाओं की सेनाओं को (प्र अवतु) भली-भाँति रक्षित करे ॥१॥
Essence
जैसे राष्ट्र में कोई वीर सेनापति स्वपक्षीय सेनाओं की शत्रुओं से रक्षा करता है और दुष्ट शत्रुओं का शस्त्रास्त्रों से वधॄ करता है, वैसे ही देह में स्थित जीवात्मा प्रबोध प्राप्त करके अपने सङ्कल्प के बल से और भुजाओं के बल से सब आन्तरिक तथा बाहरी शत्रुओं को पराजित करे ॥१॥
Subject
प्रथम मन्त्र में जीवात्मा-रूप सेनापति से रक्षा की प्रार्थना की गयी है।