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Samveda Mantra 185

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- कण्वो घौरः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
य꣡ꣳ रक्ष꣢꣯न्ति꣣ प्र꣡चे꣢तसो꣣ व꣡रु꣢णो मि꣣त्रो꣡ अ꣢र्य꣣मा꣢ । न꣢ किः꣣ स꣡ द꣢भ्यते꣣ ज꣡नः꣢ ॥१८५॥

य꣢म् । र꣡क्ष꣢꣯न्ति । प्र꣡चे꣢꣯तसः । प्र । चे꣣तसः । व꣡रु꣢꣯णः । मि꣣त्रः꣢ । मि꣣ । त्रः꣢ । अ꣣र्यमा꣢ । न । किः꣣ । सः꣢ । द꣣भ्यते । ज꣡नः꣢꣯ ॥१८५॥

Mantra without Swara
यꣳ रक्षन्ति प्रचेतसो वरुणो मित्रो अर्यमा । न किः स दभ्यते जनः ॥

यम् । रक्षन्ति । प्रचेतसः । प्र । चेतसः । वरुणः । मित्रः । मि । त्रः । अर्यमा । न । किः । सः । दभ्यते । जनः ॥१८५॥

Samveda - Mantra Number : 185
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 8;

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Meaning
प्रथम—अध्यात्मपक्ष में। ऋचा का देवता इन्द्र होने से इन्द्र को सम्बोधन अपेक्षित है। हे (इन्द्र) मेरे अन्तरात्मन् ! (यम्) जिस मनुष्य की (प्रचेतसः) हृदय में सदा जागनेवाले (वरुणः) पाप-निवारण का गुण, (मित्रः) मित्रता का गुण और (अर्यमा) न्यायकारिता का गुण (रक्षन्ति) विपत्तियों से बचाते तथा पालते हैं, (सः) वह (जनः) मनुष्य (नकिः) कभी नहीं (दभ्यते) हिंसित होता है ॥ द्वितीय—राष्ट्रपक्ष में। (यम्) जिस राजा की (प्रचेतसः) प्रकृष्ट चित्तवाले, प्रकृष्ट विज्ञानवाले, सदा जागरूक (वरुणः) पाशधारी, शस्त्रास्त्रों से युक्त, शत्रुनिवारक, सेनापति के पद पर चुना गया सेनाध्यक्ष, (मित्रः) देश-विदेश में मित्रता के संदेश को फैलानेवाला मैत्रीसचिव, और (अर्यमा) न्यायाधीश वा न्यायमन्त्री (रक्षन्ति) रक्षा करते हैं, (सः) वह (जनः) राजा (नकिः) कभी भी किसी से नहीं (दभ्यते) पराजित या हिंसित होता है ॥१॥
Essence
सब मनुष्यों को चाहिए कि पाप-निवारण, मैत्री तथा न्याय के गुणों को अपने हृदय में धारण करें, और राजा को चाहिए कि वह अपने राष्ट्र में सेनाध्यक्ष, मैत्रीसचिव, न्यायाधीश आदि के विविध पदों पर सुयोग्य जनों को ही नियुक्त करे, जिससे शत्रुओं का उच्छेद और प्रजा का उत्कर्ष निरन्तर सिद्ध होते रहें ॥१॥
Subject
प्रथम मन्त्र में मित्र, वरुण और अर्यमा का विषय है।