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Samveda Mantra 1834

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- गोषूक्त्यश्वसूक्तिनौ काण्वायनौ Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
य꣡दि꣢न्द्रा꣣हं꣢꣫ यथा꣣ त्वमीशी꣢꣯य꣣ व꣢स्व꣣ ए꣢क꣢ इ꣢त् । स्तो꣣ता꣢ मे꣣ गो꣡स꣢खा स्यात् ॥१८३४॥

य꣢त् । इ꣣न्द्र । अ꣣ह꣢म् । य꣡था꣢꣯ । त्वम् । ई꣡शी꣢꣯य । व꣡स्वः꣢꣯ । ए꣡कः꣢꣯ । इत् । स्तो꣣ता꣢ । मे꣣ । गो꣡स꣢꣯खा । गो । स꣣खा । स्यात् ॥१८३४॥

Mantra without Swara
यदिन्द्राहं यथा त्वमीशीय वस्व एक इत् । स्तोता मे गोसखा स्यात् ॥

यत् । इन्द्र । अहम् । यथा । त्वम् । ईशीय । वस्वः । एकः । इत् । स्तोता । मे । गोसखा । गो । सखा । स्यात् ॥१८३४॥

Samveda - Mantra Number : 1834
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 9; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 20; Khand » 7;

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) जगदीश्वर आचार्य वा राजन् ! (यत्) यदि (यथा त्वम्) जैसे आप हो वैसे (अहम्) मैं (वस्वः) दिव्य ऐश्वर्य का, विद्या-धन का वा भौतिक धन का (एकः इत्) अद्वितीय (ईशीय) स्वामी हो जाऊँ तो (मे) मेरा (स्तोता) प्रशंसक (गोसखा) दिव्य प्रकाशों का, समस्त वाङ्मय का वा धेनुओं का सखा (स्यात्) हो जाए ॥१॥
Essence
यदि मैं जगदीश के समान सत्य, अहिंसा, योगसिद्धि आदि दिव्य धनों का स्वामी हो जाऊँ तो सत्पात्रों को दिव्य धन बाटूँ, यदि मैं आचार्य के समान विद्या-धनों का स्वामी हो जाऊँ तो शिष्यों को विविध विद्याओं का अध्यापन करूँ, यदि मैं राजा के समान चाँदी, सोना, गाय आदि धनों का स्वामी हो जाऊँ तो निर्धनों को सोना, गाय आदि धन वितीर्ण करूँ ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा की व्याख्या पूर्वार्चिक में १२२ क्रमाङ्क पर हो चुकी है। इसमें धनपति होकर मैं क्या करूँ, इसका वर्णन है।