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Samveda Mantra 1832

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- अवत्सारः काश्यपः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
पु꣡न꣢रू꣣र्जा꣡ नि व꣢꣯र्तस्व꣣ पु꣡न꣢रग्न इ꣣षा꣡यु꣢षा । पु꣡न꣢र्नः पा꣣ह्य꣡ꣳह꣢सः ॥१८३२॥

पु꣡नः꣢꣯ । ऊ꣣र्जा꣢ । नि । व꣣र्तस्व । पु꣡नः꣢꣯ । अ꣣ग्ने । इषा꣢ । आ꣡यु꣢꣯षा । पु꣡नः꣢꣯ । नः꣣ । पाहि । अ꣡ꣳह꣢꣯सः ॥१८३२॥

Mantra without Swara
पुनरूर्जा नि वर्तस्व पुनरग्न इषायुषा । पुनर्नः पाह्यꣳहसः ॥

पुनः । ऊर्जा । नि । वर्तस्व । पुनः । अग्ने । इषा । आयुषा । पुनः । नः । पाहि । अꣳहसः ॥१८३२॥

Samveda - Mantra Number : 1832
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 9; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 20; Khand » 6;

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अग्ने) प्रकाशकों के प्रकाशक, जगन्नायक, सर्वान्तर्यामी परमेश ! आप (पुनः) फिर-फिर (ऊर्जा) बल और प्राणशक्ति के साथ, (पुनः) फिर-फिर (इषा) अभीष्ट आनन्द के साथ (आयुषा) और दीर्घायुष्य के साथ (नि वर्तस्व) हमें निरन्तर प्राप्त होते रहो। (पुनः) फिर-फिर (नः) हमें (अंहसः) पाप से (पाहि) बचाते रहो ॥२॥
Essence
मनुष्य निर्बल होने से पुनः पुनः निरुत्साह, दैन्य, दुःख, अज्ञान, पाप आदियों से लिप्त होता रहता है। वह परमात्मा की उपासना से पुनः पुनः बल, प्राण, सुख, सद्विद्या, धर्म, दीर्घायुष्य आदि प्राप्त कर सकता है ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में परमात्मा से प्रार्थना की गयी है।