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Samveda Mantra 1821

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- अग्निः पावकः Chhand- उपरिष्टाज्ज्योतिस्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ऋ꣣ता꣡वा꣢नं महि꣣षं꣢ वि꣣श्व꣡द꣢र्शतम꣣ग्नि꣢ꣳ सु꣣म्ना꣡य꣢ दधिरे पु꣣रो꣡ जनाः꣢꣯ । श्रु꣡त्क꣢र्णꣳ स꣣प्र꣡थ꣢स्तमं त्वा गि꣣रा꣢꣫ दैव्यं꣣ मा꣡नु꣢षा यु꣣गा꣢ ॥१८२१॥

ऋ꣣ता꣡वा꣢नम् । म꣣हिष꣢म् । वि꣣श्व꣡द꣢र्शतम् । वि꣣श्व꣢ । द꣣र्शतम् । अग्नि꣢म् । सु꣣म्ना꣡य꣢ । द꣣धिरे । पुरः꣢ । ज꣡नाः꣢꣯ । श्रु꣡त्क꣢꣯र्णम् । श्रुत् । क꣣र्णम् । सप्र꣡थ꣢स्तम् । स꣣ । प्र꣡थ꣢꣯स्तमम् । त्वा꣣ । गिरा꣢ । दै꣡व्य꣢꣯म् । मा꣡नु꣢꣯षा । यु꣣गा꣢ ॥१८२१॥

Mantra without Swara
ऋतावानं महिषं विश्वदर्शतमग्निꣳ सुम्नाय दधिरे पुरो जनाः । श्रुत्कर्णꣳ सप्रथस्तमं त्वा गिरा दैव्यं मानुषा युगा ॥

ऋतावानम् । महिषम् । विश्वदर्शतम् । विश्व । दर्शतम् । अग्निम् । सुम्नाय । दधिरे । पुरः । जनाः । श्रुत्कर्णम् । श्रुत् । कर्णम् । सप्रथस्तम् । स । प्रथस्तमम् । त्वा । गिरा । दैव्यम् । मानुषा । युगा ॥१८२१॥

Samveda - Mantra Number : 1821
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 9; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 20; Khand » 5;

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1 Bhashyas
Meaning
(ऋतावानम्) सत्यवान्, (महिषम्) महान् (विश्वदर्शतम्) सबके द्वारा दर्शनीय (अग्निम्) अग्रनायक आप जगदीश्वर को (सुम्नाय) सुख पाने के लिए (जनाः) स्तोता लोग (पुरः) अपने सम्मुख (दधिरे) धारण करते हैं। (श्रुत्कर्णम्) सुननेवाले कानों से युक्त, (सप्रथस्तमम्) अतिशय कीर्तिमान् (दैव्यम्) विद्वान् उपासकों का हित करनेवाले (त्वा) आपको (मानुषा युगा) पति-पत्नी-रूप मनुष्य-युगल भी (गिरा) स्तुति-वाणी से (सुम्नाय) सुखार्थ (पुरः) अपने सम्मुख (दधिरे) धारण करते हैं ॥६॥
Essence
यहाँ निराकार परमेश्वर को भी सुननेवाले कानों से युक्त कहा गया है, इससे उसका श्रोता के समान स्तोताओं के मनोरथों को पूर्ण करने का गुण सूचित होता है। जैसे कानोंवाला कोई मनुष्य कानों से स्तोता के निवेदन को सुन कर उसकी कामना को पूर्ण करता है, वैसे ही परमेश्वर बिना कानों के भी कर देता है, यह अभिप्राय है। कहा भी है, ‘वह बिना आँख के देखता है, बिना कान के सुनता है’ (श्वेता० ३।१९)। सबको चाहिए कि सत्य के प्रेमी, महान्, यशस्वी परमेश्वर को हृदय में धारण करें ॥६॥ इस खण्ड में जगदीश्वर और जीवात्मा के विषयों का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ बीसवें अध्याय में पञ्चम खण्ड समाप्त॥
Subject
आगे फिर उसी विषय को कहा गया है।