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Samveda Mantra 1811

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- जमदग्निर्भार्गवः Chhand- द्विपदा गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ते꣢ सु꣣ता꣡सो꣢ विप꣣श्चि꣡तः꣢ शु꣣क्रा꣢ वा꣣यु꣡म꣢सृक्षत ॥१८११॥

ते । सु꣣ता꣡सः꣢ । वि꣣पश्चि꣡तः꣢ । वि꣣पः । चि꣡तः꣢꣯ । शु꣣क्राः꣢ । वा꣣यु꣢म् । अ꣣सृक्षत ॥१८११॥

Mantra without Swara
ते सुतासो विपश्चितः शुक्रा वायुमसृक्षत ॥

ते । सुतासः । विपश्चितः । विपः । चितः । शुक्राः । वायुम् । असृक्षत ॥१८११॥

Samveda - Mantra Number : 1811
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 9; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 20; Khand » 4;

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Meaning
(सुतासः) परमात्मा द्वारा प्रेरित, (विपश्चितः) मेधायुक्त, (शुक्राः) पवित्र (ते) वे प्रसिद्ध ब्रह्मानन्द-रस रूप सोम (वायुम्) प्राण को (असृक्षत) ऊपर की ओर प्रेरित करते हैं ॥२॥
Essence
प्राप्त हुए ब्रह्मानन्द योगी के प्राणों को ऊपर की ओर प्रेरित करते हुए उसे मोक्ष प्रदान करते हैं ॥२॥
Subject
आगे फिर उसी विषय को कहा गया है।

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