Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Samveda Mantra 1807

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- नीपातिथिः काण्वः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
ए꣡न्द्र꣢ याहि꣣ ह꣡रि꣢भि꣣रु꣢प꣣ क꣡ण्व꣢स्य सुष्टु꣣ति꣢म् । दि꣣वो꣢ अ꣣मु꣢ष्य꣣ शा꣡स꣢तो꣣ दि꣡वं꣢ य꣣य꣡ दि꣢वावसो ॥१८०७॥

आ꣢ । इ꣣न्द्र । याहि । ह꣡रि꣢꣯भिः । उ꣡प꣢꣯ । क꣡ण्व꣢꣯स्य । सु꣣ष्टुति꣢म् । सु꣣ । स्तुति꣢म् । दि꣣वः꣢ । अ꣣मु꣡ष्य꣢ । शा꣡स꣢꣯तः । दि꣡व꣢꣯म् । य꣣य꣢ । दि꣣वावसो । दिवा । वसो ॥१८०७॥

Mantra without Swara
एन्द्र याहि हरिभिरुप कण्वस्य सुष्टुतिम् । दिवो अमुष्य शासतो दिवं यय दिवावसो ॥

आ । इन्द्र । याहि । हरिभिः । उप । कण्वस्य । सुष्टुतिम् । सु । स्तुतिम् । दिवः । अमुष्य । शासतः । दिवम् । यय । दिवावसो । दिवा । वसो ॥१८०७॥

Samveda - Mantra Number : 1807
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 9; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 20; Khand » 4;

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) जगदीश्वर ! आप (हरिभिः) आनन्द-रसों के साथ (कण्वस्य) मेधावी उपासक की (सुष्टुतिम्) उत्कृष्ट स्तुति में (उप-आयाहि) आओ। हे (दिवावसो) दीप्तिधन जगदीश ! (दिवः) तेजोमयी देह-रूप अयोध्या पुरी के (शासतः) शासक (अमुष्य) इस मेधावी उपासक की (दिवम्) तेजोमयी देह-पुरी में, आप (यय) पहुँचो ॥१॥
Essence
जैसे परमेश्वर ब्रह्माण्ड का शासक है, वैसे ही जीवात्मा देह का शासक है। वह चक्रवर्त्ती सम्राट् जगदीश्वर स्तोता की देहपुरी में आकर आतिथ्य स्वीकार करे ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में ३४८ क्रमाङ्क पर व्याख्यात हो चुकी है। यहाँ उपासक जगदीश्वर को पुकार रहा है।