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Samveda Mantra 1792

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- सुकक्ष आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
त्व꣡ꣳ हि वृ꣢꣯त्रहन्नेषां पा꣣ता꣡ सोमा꣢꣯ना꣣म꣡सि꣢ । उ꣡प꣢ नो꣣ ह꣡रि꣢भिः सु꣣त꣢म् ॥१७९२॥

त्वम् । हि । वृ꣣त्रहन् । वृत्र । हन् । एषाम् । पाता꣢ । सो꣡मा꣢꣯नाम् । अ꣡सि꣢꣯ । उ꣡प꣢꣯ । नः꣣ । ह꣡रि꣢꣯भिः । सु꣣त꣢म् ॥१७९२॥

Mantra without Swara
त्वꣳ हि वृत्रहन्नेषां पाता सोमानामसि । उप नो हरिभिः सुतम् ॥

त्वम् । हि । वृत्रहन् । वृत्र । हन् । एषाम् । पाता । सोमानाम् । असि । उप । नः । हरिभिः । सुतम् ॥१७९२॥

Samveda - Mantra Number : 1792
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 9; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 20; Khand » 3;

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Meaning
हे (वृत्रहन्) काम, क्रोध आदि छह रिपुओं के और योगमार्ग में आये हुए विघ्नों के विनाशक जीवात्मन् ! (त्वं हि) तू निश्चय ही (एषाम्) इन (सोमानाम्) ज्ञान-रसों और कर्म-रसों का (पाता) पान करनेवाला (असि) है। (नः) हमारे (हरिभिः) मनसहित ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों से (सुतम्) उत्पन्न किये गये ज्ञान और कर्म को (उप) समीपता से प्राप्त कर ॥३॥
Essence
जीवात्मा को योग्य है कि वह शुभ ज्ञान और कर्म का सम्पादन करके योग की विधि से परमात्मा के साक्षात्कार द्वारा मोक्ष प्राप्त करे ॥३॥
Subject
अगले मन्त्र में पुनः जीवात्मा को कहते हैं।

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