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Samveda Mantra 1788

1875 Mantra
Devata- सूर्यः Rishi- जमदग्निर्भार्गवः Chhand- बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती) Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
ब꣢ण्म꣣हा꣡ꣳ अ꣢सि सूर्य꣣ ब꣡डा꣢दित्य म꣣हा꣡ꣳ अ꣢सि । म꣣ह꣡स्ते꣢ स꣣तो꣡ म꣢हि꣣मा꣡ प꣢निष्टम म꣣ह्ना꣡ दे꣢व म꣣हा꣡ꣳ अ꣢सि ॥१७८८॥

ब꣢ट् । म꣣हा꣢न् । अ꣣सि । सूर्य । ब꣢ट् । आ꣣दित्य । आ । दित्य । म꣢हान् । अ꣣सि । महः꣢ । ते꣣ । सतः꣢ । म꣣हिमा꣢ । प꣣निष्टम । मह्ना꣢ । दे꣣व । महा꣢न् । अ꣣सि ॥१७८८॥

Mantra without Swara
बण्महाꣳ असि सूर्य बडादित्य महाꣳ असि । महस्ते सतो महिमा पनिष्टम मह्ना देव महाꣳ असि ॥

बट् । महान् । असि । सूर्य । बट् । आदित्य । आ । दित्य । महान् । असि । महः । ते । सतः । महिमा । पनिष्टम । मह्ना । देव । महान् । असि ॥१७८८॥

Samveda - Mantra Number : 1788
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 9; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 20; Khand » 2;

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Meaning
(बट्) सचमुच, हे (सूर्य) सूर्य ! तू (महान् असि) विशाल है, (बट्) सचमुच हे (आदित्य) आदित्य ! तू (महान् असि) महान् है। हे (पनिष्टम) सौरमण्डल में सबसे अधिक स्तुति योग्य ! (महः सतः ते) तुझ तेजस्वी की (महिमा) महिमा अद्भुत है। हे (देव) प्रकाशक ! तू (मह्ना) महिमा से (महान् असि) महान् है—यह सूर्य की अन्योक्ति से जीवात्मा को कहा गया है ॥१॥ यहाँ अन्योक्ति अलङ्कार है ॥१॥
Essence
सूर्य परिणाम में महान् है, क्योंकि उसकी परिधि आठ लाख कोस की लम्बाई से भी अधिक है; कर्म से महान् है, क्योंकि सब ग्रहोपग्रहों का प्रकाशक और जीवनाधार है; गुरुत्वाकर्षण में महान् है, क्योंकि सब आकाशीय पिण्डों को अपने आकषर्ण से धारण किये हुए है; ज्योति में महान् है, क्योंकि ज्योति का पुञ्ज ही है। इसी प्रकार मनुष्य के आत्मा में भी बहुत बड़ी शक्ति निहित है, उसे पहचानकर वह महान् कर्मों को करे, यह उसे उद्बोधन दिया गया है ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में २७६ क्रमाङ्क पर परमात्मा, राजा और आचार्य के विषय में व्याख्यात की गयी थी। यहाँ सूर्य के दृष्टान्त से जीवात्मा को उद्बोधन दे रहे हैं।

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