Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Samveda Mantra 1787

1875 Mantra
Devata- सोमः Rishi- बिन्दुः पूतदक्षो वा आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
उ꣣तो꣡ न्व꣢स्य꣣ जो꣢ष꣣मा꣡ इन्द्रः꣢꣯ सु꣣त꣢स्य꣣ गो꣡म꣢तः । प्रा꣣त꣡र्होते꣢꣯व मत्सति ॥१७८७॥

उ꣣त꣢ । उ꣣ । नु꣢ । अ꣣स्य । जो꣡ष꣢꣯म् । आ । इ꣡न्द्रः꣢꣯ । सु꣣त꣡स्य꣢ । गो꣡म꣢꣯तः । प्रा꣣तः꣢ । हो꣡ता꣢꣯ । इ꣡व । मत्सति ॥१७८७॥

Mantra without Swara
उतो न्वस्य जोषमा इन्द्रः सुतस्य गोमतः । प्रातर्होतेव मत्सति ॥

उत । उ । नु । अस्य । जोषम् । आ । इन्द्रः । सुतस्य । गोमतः । प्रातः । होता । इव । मत्सति ॥१७८७॥

Samveda - Mantra Number : 1787
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 9; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 20; Khand » 2;

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
(उत उ नु) और (प्रातः) प्रातःकाल (सुतस्य) ब्रह्मयज्ञ द्वारा परिस्रुत, (गोमतः) प्रकाशयुक्त (अस्य) इस ब्रह्मानन्द-रूप सोमरस के (जोषम्) सेवन की (इन्द्रः) योगी मनुष्य (मत्सति) स्तुति करता है, (होता इव) जैसे होम करनेवाला मनुष्य अग्नि की स्तुति करता है ॥३॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥३॥
Essence
जैसे प्रातःकाल देवयज्ञ में अग्नि में होम करनेवाला पुरुष अग्नि की स्तुति करता है, वैसे ही योगी ब्रह्मयज्ञ में परमात्मा की सङ्गति से प्राप्त आनन्द की स्तुति करता है ॥३॥
Subject
आगे फिर ब्रह्मानन्द का विषय है।