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Samveda Mantra 1786

1875 Mantra
Devata- सोमः Rishi- बिन्दुः पूतदक्षो वा आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
पि꣡ब꣢न्ति मि꣣त्रो꣡ अ꣢र्य꣣मा꣡ तना꣢꣯ पू꣣त꣢स्य꣣ व꣡रु꣢णः । त्रि꣣षधस्थ꣢स्य꣣ जा꣡व꣢तः ॥१७८६॥

पि꣡ब꣢꣯न्ति । मि꣣त्रः꣢ । मि꣣ । त्रः꣢ । अ꣣र्यमा꣢ । त꣡ना꣢꣯ । पू꣣त꣡स्य꣢ । व꣡रु꣢꣯णः । त्रि꣣षधस्थ꣡स्य꣢ । त्रि꣣ । सधस्थ꣡स्य꣢ । जा꣡व꣢꣯तः ॥१७८६॥

Mantra without Swara
पिबन्ति मित्रो अर्यमा तना पूतस्य वरुणः । त्रिषधस्थस्य जावतः ॥

पिबन्ति । मित्रः । मि । त्रः । अर्यमा । तना । पूतस्य । वरुणः । त्रिषधस्थस्य । त्रि । सधस्थस्य । जावतः ॥१७८६॥

Samveda - Mantra Number : 1786
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 9; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 20; Khand » 2;

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1 Bhashyas
Meaning
(तना) विस्तृत रूप से (पूतस्य) पवित्र, (त्रिषधस्थस्य) आत्मा, मन, प्राण इन तीन स्थानों में स्थित (जावतः) वेगयुक्त ब्रह्मानन्द-रस को (मित्रः) मैत्री, करुणा, मुदिता, उपेक्षा वृत्तियों से युक्त योगी, (अर्यमा) सूर्यवत् तेजस्वी एवं ज्योतिष्मती प्रज्ञा से युक्त योगी और (वरुणः) व्याधि, स्त्यान, संशय आदि विघ्नों का जिसने निवारण कर दिया है, ऐसे योगी (पिबन्ति) पान करते हैं ॥२॥
Essence
परिपक्व योगी ही समाधि में स्थित होकर पवित्र ब्रह्मानन्द-रस का आस्वादन करते हैं ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में यह बताया गया है कि कैसे ब्रह्मानन्द-रस को कौन पीते हैं।